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                                                                                                                                                                                                                 (1994) आज इंसा की आँख का पानी मर गया सुना है के फिंजा में हिंसा का रंग भर गया ‘ तन्हा ’ समाज काफी प्रगतिशील हो गया परिवार ‘ चोली के पीछे ’ देखने के काबील हो गया ये तो आगाज है प्रगति का अंजाम क्या होगा आज ये हाल है भारतवर्ष का तो कल क्या होगा सम्भालना ह...

उल्फत - एक गज़लनुमा गीत

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  उल्फत जीवन में ना साथ तुम्हारा ये उल्फत को ना होगा गवारा भटक जाउँ जीवन की राह से ढूंढता हुआ तुम्हें हो जाउँ आवारा तुमको भी कैसे होगा ये गवारा कहा है किसी ने इश्क पर जोर नहीं है मुझे भी इस बात का यकीं जीना मरना होगा साथ हमारा तुम्हारा जीवन में न हो साथ तुम्हारा ये उल्फत को ना होगा गवारा   (मेरी मोहब्बत में ही कशिश न थी वर्ना नहीं तो क्या तुम बेवफा थे)

आँख - ग़ज़लनुमा एक गीत

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  आँख क्या खबर थी इस तरह तूं बेवफा होगी छोड़ दोगी साथ मोहब्बत भरा तोड़ दोगी दिल उल्फत भरा इस तरह मोहब्बत रुसवा होगी (क्या खबर थी)-2 इस तरह तूं बेवफा होगी होश आया तो पता चला मुझको आशिकी थी ही नहीं शरारत भर थी क्या खबर थी इस तरह तूं बेवफा होगी फिर इस तरह कभी मुलाकात होगी आँख मिलेगी और मुस्करा दोगी (क्या खबर थी)-2 इस तरह तूं बेवफा होगी बहुत समझाया दिल को ज़ख्म भरा ही नहीं सोचा ही नहीं तूने क्या हालत मेरी होगी क्या खबर थी इस तरह तूं बेवफा होगी

मंजिल - एक ग़ज़लनूमा गीत

  मंजिल जरा आगे से हट जाए जमाना तो मैं देखूं कहाँ है मयख़ाना खूब लुटाई है दौलत मोहब्बत की मगर खाली नहीं होता ख़ज़ाना कहते हुए दम घटु रहा है कैसे कहूँ ग़ज़ल आशिकाना जरा आगे से हट जाए जमाना ना मंजिल है कोई ना पता है मुझे कहाँ है जाना जरा आगे से हट जाए जमाना बाद तेरे कौन सिखाएगा जीना जाते जाते हमें ये बता जाना तुम्हीं से सीखा है मुस्कराना बाद तेरे कौन सिखाएगा रोना जाते जाते हमें ये समझा जाना वक्त मिले तो, कभी ... दिलासा देने हमें, आ जाना जब जरा आगे से हट जाए जमाना

तन्हाई - एक गीत

  तन्हाई तुमने हमको भुला दिया तो कोई गम नहीं तुम ना सही जहाँ में हंसी नजारे तो कोई कम नहीं तुमने हमको भुला दिया तो कोई गम नहीं तुम बिन जी लेंगे हम बहाने तो कोई कम नहीं तुमने हमको भुला दिया तो कोई गम नहीं एक अरमां जला के गए हो मेरा नए सपने सजा लूंगा मैं, सपने तो कोई कम नहीं तुमने हमको भुला दिया तो कोई गम नहीं तिनके बिखरा के गए हो आशियां के मेरे जोड़ लूंगा मैं इनको, टुकड़े तो कोई कम नहीं तुमने हमको भुला दिया तो कोई गम नहीं रोशनी कम ना होगी गर एक ‘ तन्हा ’ सितारा टूट भी गया आसमां में सितारे तो कोई कम नहीं तुमने हमको भुला दिया ......

बेगैरत - सा पंछी (एक कविता)

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                                 बेगैरत-सा पंछी अभिमानशून्य, बेगैरत-सा वो पंछी   लौट आता बार बार उसी डाल पर जिस डाल के अपनों से धकियाया जाता रहा लौट आता बार बार उसी डाल पर जिस डाल के घोंसले से गिराया जाता रहा जबकि खुद के पंख-भी आए न थे कौवा-कौवी पाल लेते होंगे कोयल के अभिमानशून्य, बेगैरत-सा वो पंछी, पुष्पित-पल्लवित हुआ, घोंसला भी बनाया और, गैरत ललकारती रही उसकी   कि न लौट के जा उसी डाल पर होता रहा अपमानित बार बार, पर जन्मस्थली का मोह छूटा नहीं अभिमानशून्य, बेगैरत-सा वो पंछी मान अपमान सोचता नहीं कभी उस डाल के पंछी ललकारते सभी हमारे बिना रह नहीं पाएगा तूं कभी संगी का भी अपमान सहता क्या कोई कभी चुनौती तुम्हारी स्वीकार है अभी अकेला ही चलता रहा कब से, चलूंगा आगे-भी

मुसाफिर / यात्री / The Traveller /पथिक एक कविता

  मुसाफिर मुसाफिर हैं सभी, तुम भी और हम भी, होगी कभी न कभी सफर में मुलाकात भी, जाने कितनी है जिंदगी, होगी एक रात-आखरी भी, कल न होंगे, नहीं कोई इसका गिला भी, पर रहेगा यादों का एक सिलसिला भी, जो मिले हैं लम्हें, चल हंस कर बिता लें अभी, जाने क्या फैसला हो वक्त का भी, कौन जाने पैगाम आ जाए, जाम के बजाय आखरी शाम आ जाए, हम खोजा करते हैं मुलाकात के बहाने भी, कि काम आ जाए किसी के ये जिंदगी भी, एक दिन तो छोड़ना होगा ये मकां, चुकाना होगा किराया भी, जो लेना है ले लो और जो देना है दे दो, मैं गुलाम सही तेरा, तूं सिकंदर सही जाना होगा खाली हाथ, मुझे भी, तूझे भी।
एक बार एक औरत अपने गधे को एक ऋषि के पास लेकर गई और ऋषि से अपने गधे को  घोड़ा बनाने का तरीक़ा बताने की याचना की। ऋषि भविष्यदृष्टा था। ऋषि ने कहा मैं  इसे घोड़ा बनाने का तरीक़ा बता रहा हूँ, पर एक दिन ये घोड़ा बनकर भी मुझे ही दुल्लती मारेगा। और दस साल बाद ऋषि का कथन सत्य सिद्ध हुआ । अब ऋषि ने सोच लिया है कि फिर किसी गधे को घोड़ा होने का मार्ग नहीं बताना है। हालांकि संभव है कि गधा फिर भी घोड़ा बन जाए। पर तब दुल्लती खाने पर भी ऋषि को दुख नहीं होगा। 

सुपरनोवा

आसमां में सितारे कम ना होंगे, अगर एक तारा सुपरनोवा हो गया तो।

चलने की अदा

दिखावा छोड़कर पैदल चलें      शहरी भारत को अपने पैदलपथों को मुक्त करके पैदल चलना आरम्भ करना होगा।        हमेशा की तरह, देश के संरचनात्मक ढांचे के निर्माण तथा सुधार पर खरबों रुपये खर्च करने का दिखावा करने वाला भारत एक चीज को नज़रअंदाज कर रहा हैः पैदलपथ अथवा पटड़ियां बिछाना। प्रत्येक स्तर पर सरकारी नीतियां, भारत को मोटर वाहनों पर आधारित देश बनाने पर तुली हुई हैं। पैदल चलने के लिए कोई राह नहीं है। साइकल-लेनों की बात छोड़ दीजिए, शहर दर शहर और नगर दर नगर पटड़ियों और पैदलपथों (फुटपाथों) पर सामान बेचनेवालों, वाहनों, गड्ढों, खुली नालियों ने कब्जा कर लिया है या फिर ये घोर नजरअंदाजी, दुर्दशा तथा लापरवाही का शिकार हो चुके हैं।        तेज गति से वाहन चलाना आज की जीवनशैली बन चुकी है। हर कोई नई गाड़ियों और नवीनतम सड़कों की बात करता है। वाहनों की संख्या असीमित रूप से बढ़ती जा रही है। कितने भी उड़ानपुल और पारपथ तथा ओवरब्रिज बनाए जाएं इस समस्या का हल नहीं होगा। केवल कुछ मील लम्बी नहीं बल्कि कई दिनों तक के ट्रैफिक ...

Problems arising during Hindi Translation of Scientific Terminology/वैज्ञानिक शब्दावली के हिंदी में अनुवाद के दौरान पेश आने वाली समस्या

अकसर अनुवाद करते समय एक समस्या सामने आती है कि क्या वैज्ञानिक शब्दावली को हिंदी में अनुवाद करना चाहिए या नहीं अर्थात् उसी भाषा के शब्द को हिंदी में (ट्रांसलिटरेट करके) लिख देना चाहिए , जिस भाषा में उस विषय पर मूल सिद्धान्त दिया या खोज की गई थी। जैसे क्या इलैक्ट्रॉन को इलैक्ट्रॉन ही लिख देना चाहिए या इसे कोई हिंदी का सरल शब्द दिया जाए जैसे कि ‘ ऋणात्मक कण ’ या ऐसा ही कुछ और जिससे इसके पढ़ते ही इस कण के बारे में सहज अनुभूति पाठक अपनी भाषा में अपने मस्तिष्क में कर सके। पंजाबी के साहित्यकार श्री कुलदीप सिंह धीर मानते हैं कि पंजाबी में सांईस पढ़ाते समय वैज्ञानिक शब्दावली का पंजाबी में अनुवाद करने का कोई लाभ नहीं है। क्या सल्फर को गंधक नहीं लिखना चाहिए ? क्या थ्योरी ऑफ रिलेटिववीटी का भारतीय भाषा में अनुवाद नहीं करना चाहिए। यह एक तथ्य है कि हम अपनी भाषा में चीजों को बेहतर ढ़ंग से सहज ज्ञान के माध्यम से सहजता से समझ लेते हैं। मुश्किल ये है कि पश्चिमी विज्ञान अभी चरण वार खोज की दिशा में है, जबकि भारतीय विज्ञान को कहानियों में समेट कर तब गुरुकलों में पढ़ाया जाता था जब लिखने के साधन बहुत म...

कॉरपॉरेट जगत में भविष्य के नीति - निर्माता LEADER OF FUTURE

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भविष्य की नीति निर्माता आज की पीढ़ी के युवा क्रियाशील, कैरियर के प्रति जागरुक हैं तथा अपने भविष्य के लिए पहले से योजना बनाकर रखते हैं। वर्तमान पीढ़ी को पता है कि कम्पनियों को भविष्य के लिए रणनीतिकार - नेतृत्व विकसित करने हेतु उनकी आवश्यकता है और ऐसी कम्पनी के साथ ये युवा काम करना पसंद करते हैं जिसके लक्ष्य उनके स्वयं के लक्ष्यों के साथ मेल खाते हैं।        अनिश्चित तथा परिवर्तनशील समय में कम्पनी के भीतर नेतृत्व विकसित किया जाना आवश्यक है। ऐसे समय में , कम्पनियों को केवल योग्य नेतृत्व ही उबार सकता है। ज्यादातर कम्पनियां नेतृत्व संस्कृति को विकसित करने पर ध्यान नहीं देती। इसलिए कम्पनी के भीतर उद्यमिता को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है तथा कम्पनियों को ऐसी संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता है जिसमें संगठन के अंदर से ही नेतृत्व उभरकर आए। अत्यधिक पदसोपान वाले ढांचागत परिवेश में कार्यरत रही पुरानी पीढ़ी के विपरीत, नई पीढ़ी के युवा अनेक प्रकार से काफी नई सोचविचार वाले तथा सृजनात्मक हैं। इसलिए वे चाहते हैं कि उनका काम अर्थपूर्ण हो। उनके लिए व्यैक्तिक पहचान अ...
यमदूतों की गलतीः दुर्गी की कहानी बरसों पहले की बात है, एक थे दुर्गी जिनका वास्तविक नाम तो दुर्गा प्रसाद था। इन्हें लेने के लिए यमदूत आए थे परन्तु ये अपनी चालाकी से उनके चंगुल से बच निकले। कुछ इनकी चालाकी थी कुछ यम के उन कारिंदों की नरमदिली। दुर्गी निर्धन व्यक्ति थे। किसी फैक्ट्री में काम करके गुजारा करते थे। घर में दो ही प्राणी थे एक ये और एक इनकी पत्नी। छोटा - सा घर था। रोहतक में सैनी पुरा समाप्त होने के बाद , कई मोहल्लों का सांझा तालाब (जोहड़) था। उसी जोहड़ के निकट ये निर्धन दम्पति रहते थे। यह एक गंदी - सी जगह थी। आसपास के इलाके के अपेक्षाकृत सम्पन्न लोगों के घरों की निकासी का गंदा पानी इन गरीबों के घरों के पास से गुजरते एक नाले के रूप में इसी जोहड़ में जा गिरता था। ऐसे ही एक अपेक्षाकृत सम्पन्न परिवार की डेयरी में, दुर्गी से रात में सोने की जगह के बदले में चौकीदारी करायी जाती थी। गरीब का हर कोई लाभ उठाता है। लगभग फ्री का चौकीदार। एक रात भोजन के बाद, दुर्गी जी सोने के लिए डेयरी में आए और सो गए। डेयरी के मालिक का हाल ही में विवाह हुआ था। इसलिए मालिक डेयरी से दूर अपने घर सोने चला...
                                   Postman, The Time continuously distributing letters                                                      Why did he devoid me this pleasures What would be told, nameless, me Homeless, address not found, kept asking Unable to sleep with open eyes, Day and Night Dreaming about sweetheart, Missing Her Though out life
प्रिय मित्रों, मेडिकल क्लेम, लिव ईनकैसमैंट आदि के डाक विभाग के तैयार द्विभाषी फॉर्म मेरे पास उपलब्ध हैं।                                                                          डाक विभाग Department of Posts मुख्य पोस्टमास्टर जनरल Chief Postmaster General ……………….. सर्किल , …………………. ……………. Circle, …………………….. सेवा में, To                                                                                ...