मंजिल - एक ग़ज़लनूमा गीत
मंजिल
जरा आगे से हट जाए
जमाना
तो मैं देखूं कहाँ
है मयख़ाना
खूब लुटाई है दौलत
मोहब्बत की
मगर खाली नहीं होता
ख़ज़ाना
कहते हुए दम घटु रहा
है
कैसे कहूँ ग़ज़ल
आशिकाना
जरा आगे से हट जाए
जमाना
ना मंजिल है कोई ना
पता है
मुझे कहाँ है जाना
जरा आगे से हट जाए
जमाना
बाद तेरे कौन
सिखाएगा जीना
जाते जाते हमें ये
बता जाना
तुम्हीं से सीखा है
मुस्कराना
बाद तेरे कौन
सिखाएगा रोना
जाते जाते हमें ये
समझा जाना
वक्त मिले तो, कभी
...
दिलासा देने हमें, आ
जाना
जब जरा आगे से हट
जाए जमाना
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