कॉरपॉरेट जगत में भविष्य के नीति - निर्माता LEADER OF FUTURE
भविष्य की नीति निर्माता
आज की पीढ़ी के युवा
क्रियाशील, कैरियर के प्रति जागरुक हैं तथा अपने भविष्य के लिए पहले से योजना
बनाकर रखते हैं। वर्तमान पीढ़ी को पता है कि कम्पनियों को भविष्य के लिए रणनीतिकार-नेतृत्व विकसित करने हेतु उनकी आवश्यकता है और
ऐसी कम्पनी के साथ ये युवा काम करना पसंद करते हैं जिसके लक्ष्य उनके स्वयं के
लक्ष्यों के साथ मेल खाते हैं।
अनिश्चित तथा
परिवर्तनशील समय में कम्पनी के भीतर नेतृत्व विकसित किया जाना आवश्यक है। ऐसे समय
में, कम्पनियों को केवल योग्य नेतृत्व ही उबार सकता
है। ज्यादातर कम्पनियां नेतृत्व संस्कृति को विकसित करने पर ध्यान नहीं देती।
इसलिए कम्पनी के भीतर उद्यमिता को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है तथा कम्पनियों
को ऐसी संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता है जिसमें संगठन के अंदर से ही नेतृत्व
उभरकर आए। अत्यधिक पदसोपान वाले ढांचागत परिवेश में कार्यरत रही पुरानी पीढ़ी के
विपरीत, नई पीढ़ी के युवा अनेक प्रकार से काफी नई सोचविचार वाले तथा सृजनात्मक
हैं। इसलिए वे चाहते हैं कि उनका काम अर्थपूर्ण हो। उनके लिए व्यैक्तिक पहचान अधिक
मायने रखती है। संभवतः नई पीढ़ी के युवा औपचारिकता, पदसोपान तथा अथोरिटी रहित नए
प्रकार के संगठनात्मक ढांचे का नेतृत्व करने जा रही है।
भविष्य में भारतीय कोरपोरेट
जगत का नेतृत्व महत्वकांक्षी नई पीढ़ी के युवाओं के हाथों में रहेगा तो उनके
तकनीकी कौशल तथा प्रबंधकीय योग्यताओं के सम्मिलित प्रभाव से उनकी सोच तथा दर्शन
में आई लोचशीलता से इन कम्पनियों को फायदा मिलेगा।
नई पीढ़ी के युवाओं
को भारतीय कोरपोरेट जगत के भविष्य के तथाकथित नेतृत्व के रूप में पेश किया जा सकता
है बशर्ते उन्हें इसके लिए विकसित किया जाए। कम्पनियां इसे किस प्रकार अंजाम दे
सकती हैं? भविष्य
के लिए युवाओं को चिह्नित करने व विकसित करने के लिए कम्पनी को सर्वप्रथम भविष्य
के नेतृत्व की अपेक्षाओं की तुलना, वर्तमान क्षमताओं से करनी होगी। कम्पनी को
देखना होगा कि किन लोगों में विकास की संभावना सबसे अधिक है तथा इसका बेहतरीन लाभ
उठाते हुए सकारात्मक रूप से अवसरों का विकास करना होगा। इन लोगों की स्थिति का
मूल्यांकन करके यह पता लगाना होगा कि इन्हें कैसे संवारा जाए। कम्पनी को नेतृत्व
के लिए अपेक्षित क्षमताओं यथा नेतृत्व करने में उत्सुकता एवं नेतृत्व की तीव्र
इच्छा, हद के पार जाकर सोचना आदि को परिभाषित करना पड़ेगा। लोगों को नेतृत्व की
भूमिका के लिए तैयार करने में सिखाने व सलाह देने की अहम भूमिका है।
नेतृत्व का वास्ता
लोगों के सोचने व निर्णय लेने के तरीकों से है। अन्य बातों के साथ-साथ, किसी
व्यक्ति में सोचने व निर्णय लेने की क्षमता काफी हद तक जन्मजात होती है। अतः यदि
आप भीतर से प्रबंधकीय नेतृत्व को विकसित करना चाहते हैं तो आपको शुरुआती स्तर पर
ही सही व्यक्ति की भर्ती करनी पड़ेगी। नेतृत्व के व्यवहार को दो भागों में
परिभाषित किया जा सकता है- एक में शामिल हैं-मूल्य तथा अभिवृत्ति। दूसरा भाग-सामर्थ्य
व क्षमता है। पहला भाग जन्मजात होता है। इसलिए यह आवश्यक है कि भविष्य के नेताओं
का चयन करते समय मूल्यों तथा अभिवृत्ति पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए। सामर्थ्य एवं
क्षमता का विकास किया जा सकता है और इन्हीं दो बिन्दुओं पर प्रशिक्षण व सलाह के
माध्यम से काम करते हुए, कम्पनियों में नेतृत्व तथा सही ढंग से कार्य सम्पन्न करने
की क्षमता को विकसित किया जा सकता है।
यह भी बहुत जरुरी है
कि कम्पनियों में अग्रपंक्ति के प्रबंधकों के रूप में विकसित किए जा सकने वाले
कर्मचारियों को चिह्नित करने की प्रक्रिया निर्धारित की जाए। कम्पनियों को उन
व्यक्तियों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है जिनमें ऐसे गुण हों जो
प्रबंधकों के चयन में मददगार हों। वह अवश्य ही उच्च कार्यनिष्पादन-क्षमतायुक्त हो,
सोच लचीली हो, अन्य लोगों के विचारों के प्रति ग्रहणशील हो तथा संबंधों का जाल
बनाने व बनाए रखने में निपुण हो। उच्च संभावना वाले लीडरों को उन व्यक्तियों या
उच्च प्रबंधन से सलाह मिलती रहनी चाहिए जिनका कार्यनिष्पादन उच्च स्तर का रहा हो।
सफल कम्पनियों में
कम्पनियों का तीव्र विकास, एक लीडर से दूसरे को सफल ढंग से कम्पनी का हस्तांतरण
तथा स्पष्ट रूप से लीडरों की निरन्तर आपूर्ति की व्यवस्था से ऐसी धारणा विकसित
होती है कि इन फर्मों की सफलता का कारण इनकी नेतृत्व-आपूर्ति बनाए रखने की क्षमता
को विकसित करने, सभी स्तरों पर लीडरों को चिह्नित करने तथा उन्हें सशक्त बनाने की
योग्यता है। संभावित लीडरों का विकास करने व पदसोपान की सीढ़ी पर ऊपर चढ़ने में
मदद करने के लिए विकसित किए गए आंतरिक प्रशिक्षण एवं मार्गदर्शन कार्यक्रम अत्यधिक
प्रभावी व निर्णायक होते हैं।
निष्कर्ष यह है कि
यदि उचित समय पर चिह्नित कर लिए जाएं तो नई पीढ़ी के युवा कर्मचारियों को प्रशिक्षण,
मार्गदर्शन व सलाह देकर निश्चय ही भारतीय कारपोरेट जगत के भविष्य के प्रभावी
नेताओं के रूप में विकसित किया जा सकता है।




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