यमदूतों की गलतीः दुर्गी की कहानी
बरसों पहले की बात है, एक थे दुर्गी जिनका वास्तविक नाम तो दुर्गा प्रसाद था। इन्हें लेने के लिए यमदूत आए थे परन्तु ये अपनी चालाकी से उनके चंगुल से बच निकले। कुछ इनकी चालाकी थी कुछ यम के उन कारिंदों की नरमदिली। दुर्गी निर्धन व्यक्ति थे। किसी फैक्ट्री में काम करके गुजारा करते थे। घर में दो ही प्राणी थे एक ये और एक इनकी पत्नी। छोटा-सा घर था। रोहतक में सैनी पुरा समाप्त होने के बाद, कई मोहल्लों का सांझा तालाब (जोहड़) था। उसी जोहड़ के निकट ये निर्धन दम्पति रहते थे। यह एक गंदी-सी जगह थी। आसपास के इलाके के अपेक्षाकृत सम्पन्न लोगों के घरों की निकासी का गंदा पानी इन गरीबों के घरों के पास से गुजरते एक नाले के रूप में इसी जोहड़ में जा गिरता था। ऐसे ही एक अपेक्षाकृत सम्पन्न परिवार की डेयरी में, दुर्गी से रात में सोने की जगह के बदले में चौकीदारी करायी जाती थी। गरीब का हर कोई लाभ उठाता है। लगभग फ्री का चौकीदार। एक रात भोजन के बाद, दुर्गी जी सोने के लिए डेयरी में आए और सो गए।
डेयरी के मालिक का हाल ही में विवाह हुआ था। इसलिए मालिक डेयरी से दूर अपने घर सोने चला जाता था और सुबह दूध दोहने के समय 4 से 5 बजे के बीच आता था। एक दिन मालिक आया तो दुर्गी को वहां न पाया और डेयरी का द्वार भी खुला पड़ा था तो ये सोचकर कि दुर्गी की कहीं तबियत तो खराब नहीं है जो सोने नहीं आया और द्वार खुला क्यूं छोड़ गया। कुछ आशंकित होकर डेयरी मालिक दूध दुहाकर, दुर्गी के घर उसका हालचाल पूछने गया।
दुर्गी ने बताया - अब वह डेयरी में सोने नहीं जाएगा। वहाँ उसने भयावह सपना देखा है। डेयरी में तो कोई ओपरी छाया है। डेयरी मालिक सोच में पड़ गया कि हो न हो डेयरी के अन्दर बड़बेरी (बेर) के पेड़ पर रहने वाले भूत ने ही दुर्गी को डराया होगा। पर वो भूत अच्छा था वो तभी किसी को दिखाई पड़ता था जब कोई कुछ गलत हरकत कर रहा होता और दुर्गी जैसे भले उम्रदराज़ आदमी से किसी अनैतिक गलती की उम्मीद डेयरी मालिक को नहीं थी। पूछने पर दुर्गी ने बताया कि रात को मैं घेर (डेयरी) में सो गया तो लगभग 3 बजे किसी ने मुझे जगाया और कहा – उठो! दुर्गा प्रसाद, चलो, चलने का टाईम हो गया। मैंने आँखें खोलकर देखा तो पाया कि चार काले-काले लम्बे तगड़े लाल-लाल आँखों वाले आदमी खड़े हैं और मुझे कहीं ले चलने के लिए आए हैं। मैं उन्हें देखकर डर गया। इतने में एक बोला- कुछ काम बाकी हो तो कर लो। मैंने कहा – भाई! एक बीड़ी पी लूँ क्या? उसने अनुमति देते हुए कहा – हाँ पी लो। मैंने एक बीड़ी सिलगाई तो वे नजर नहीं आए। मुझे लगा सपना देख रहा हुंगा। पर थोड़ी देर में बीड़ी बुझने पर वे फिर नजर आने लगे। मैंने एक बीड़ी और पीने की अनुमति माँगी। बीड़ी सुलगाई तो वे फिर गायब हो गए। मैं समझ गया कि बीड़ी सिलगाने पर ये नजर नहीं आते सो मैं लगातार एक के बाद एक पूरे बंडल की बीड़ी पी गया और सुबह का उजाला होते ही वहाँ से दौड़ा चला आया। घर आकर बुखार आ गया सो आपको कुछ सूचना दे न पाया और इसी हड़बड़ी में डेयरी का द्वार भी खुला ही रह गया।
ये सब सुनकर मालिक मुस्कराया और बोला – भाई दुर्गी! तुम तो बड़े भाग्यशाली रहे। वे तो यमदूत थे। जिस दुर्गाप्रसाद को लेने आए थे उसे वे ले गए। अगली गली में ही दुर्गाप्रसाद शर्मा की मृत्यु आज तड़के सुबह 4 बजे हो गई है। अब आप बेफिक्र हो जाओ। आधार कार्ड लागू होने से भी इस तरह की गलतियां वहाँ नहीं होंगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।   

Comments

Unknown said…
हमें ये घटना याद है

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