मुसाफिर / यात्री / The Traveller /पथिक एक कविता

 

मुसाफिर

मुसाफिर हैं सभी, तुम भी और हम भी,

होगी कभी न कभी सफर में मुलाकात भी,

जाने कितनी है जिंदगी, होगी एक रात-आखरी भी,

कल न होंगे, नहीं कोई इसका गिला भी,

पर रहेगा यादों का एक सिलसिला भी,

जो मिले हैं लम्हें, चल हंस कर बिता लें अभी,

जाने क्या फैसला हो वक्त का भी,

कौन जाने पैगाम आ जाए,

जाम के बजाय आखरी शाम आ जाए,

हम खोजा करते हैं मुलाकात के बहाने भी,

कि काम आ जाए किसी के ये जिंदगी भी,

एक दिन तो छोड़ना होगा ये मकां, चुकाना होगा किराया भी,

जो लेना है ले लो और जो देना है दे दो,

मैं गुलाम सही तेरा, तूं सिकंदर सही

जाना होगा खाली हाथ, मुझे भी, तूझे भी।

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