Problems arising during Hindi Translation of Scientific Terminology/वैज्ञानिक शब्दावली के हिंदी में अनुवाद के दौरान पेश आने वाली समस्या
अकसर अनुवाद करते समय एक समस्या सामने आती है कि
क्या वैज्ञानिक शब्दावली को हिंदी में अनुवाद करना चाहिए या नहीं अर्थात् उसी भाषा
के शब्द को हिंदी में (ट्रांसलिटरेट करके) लिख देना चाहिए, जिस भाषा में उस विषय पर मूल सिद्धान्त दिया या
खोज की गई थी। जैसे क्या इलैक्ट्रॉन को इलैक्ट्रॉन ही लिख देना चाहिए या इसे कोई
हिंदी का सरल शब्द दिया जाए जैसे कि ‘ऋणात्मक
कण’ या ऐसा ही कुछ और जिससे इसके पढ़ते ही इस कण के
बारे में सहज अनुभूति पाठक अपनी भाषा में अपने मस्तिष्क में कर सके। पंजाबी के
साहित्यकार श्री कुलदीप सिंह धीर मानते हैं कि पंजाबी में सांईस पढ़ाते समय
वैज्ञानिक शब्दावली का पंजाबी में अनुवाद करने का कोई लाभ नहीं है। क्या सल्फर को
गंधक नहीं लिखना चाहिए? क्या थ्योरी ऑफ रिलेटिववीटी का भारतीय भाषा में अनुवाद नहीं करना चाहिए। यह एक तथ्य है कि हम
अपनी भाषा में चीजों को बेहतर ढ़ंग से सहज ज्ञान के माध्यम से सहजता से समझ लेते
हैं। मुश्किल ये है कि पश्चिमी विज्ञान अभी चरण वार खोज की दिशा में है, जबकि
भारतीय विज्ञान को कहानियों में समेट कर तब गुरुकलों में पढ़ाया जाता था जब लिखने
के साधन बहुत महंगे थे और सहज उपलब्ध नहीं थे या फिर वे अप्राकृतिक साधनों का
इस्तेमाल नहीं करना चाहते थे। ये गुरुकुल महाविस्फोट (बिग बैंग) को आज के पश्चिमी
वैज्ञानिकों से बेहतर समझते थे परन्तु इनकी पुस्तकों में ये सिद्धान्त एक अलग ही शब्दावली
में हैं जिन्हें आज समझना थोड़ा कठिन है। एक कारण ये भी है कि इन कहानियों का
विशद् वर्णन संबंधित विषय के आचार्यों के द्वारा केवल मौखिक तौर पर किया जाता था।
वे आचार्य अब उपलब्ध नहीं हैं। इनकी शब्दावलियों में ऊर्जा कणों के लिए जो शब्द
प्रयुक्त हुए हैं जैसे विष्णु, महाविष्णु, ब्रह्मा, महादेव, शिव, महाशिव आदि हमारे
मस्तिष्क में देवताओं की कहानियों में उल्लेखित साधारण अर्थ में रूढ़ हो चुके हैं।
इसी प्रकार विष्णु अवतारों के माध्यम से बताई गई धरती के उद्भव की कहानी को और
डार्विन के उद्भव के सिद्धान्त को समझने के घालमेल में सामान्य व्यक्ति यह समझ
नहीं पाता है कि कौनसा सिद्धान्त ठीक है। हालांकि दोनों एक ही बात अलग अलग
शब्दावली में बता रहे हैं। लेकिन डार्विन उसे ज्यादा सही और वैज्ञानिक लगता है
क्योंकि उसके पास शुरू से आज तक खोजे गए जीवाश्मों की साक्षी प्रकट रूप में उपलब्ध
है। डार्विन ने केवल पुरानी बात को नए तथ्यों के साथ प्रकट भर किया है। बात
शब्दावली व सहज ज्ञान सम्प्रेषण की ही है। अपनी भाषा के प्रतीक चिह्नों (शब्दावली)
के माध्यम से विज्ञान को समझना सहज होगा ऐसा लगता है। एक उदाहरण और (महाविस्फोट,
इलैक्ट्रान के अलावा) रमन-प्रभाव कुछ सहज लगता है या रामन इफेक्ट सहज लगा। सोलर
फ्लेयर या सौर-कणों की भभक या केवल सौर-भभक सहज है समझने में। सही है कि अपनी भाषा
में समझना आसान होगा परन्तु अनुवादकों का काम और कठिन हो जाएगा। पोटाश को हिंदी
में क्या कहें, पढ़ो संस्कृत के ग्रंथ। बढ़ गया काम। विज्ञान की बजाय आज साइंस शब्द
सहज-सरल लगता है। तो साइंस कहने में हर्ज क्या है। कहने वाले कहेंगे कि अपनी जड़
से साइंस(शब्द) हमें जुदा कर देता है। पर उस पीढ़ी का ध्यान भी तो रखना है जो
अंग्रेजी माध्यम से पढ़ गए। आज क्या हम वापस हिंदी या संस्कृत की ओर मुड़ जाएं या
अन्तर्राष्ट्रीय भाषा (निसन्देह अंग्रेजी है) की ओर। यदि अंग्रेजी की ओर मुड़ना है
तो हिंदी को केवल एक विषय के रूप में पढ़ाकर राष्ट्रीय अस्मिता, स्वाभिमान के
प्रति कर्तव्य की इतिश्री मान ली जाए। क्योंकि जब आप विज्ञान कुछ गिने चुने अंग्रेजी
वालों तक सीमित कर देंगे और सहज भाषा में विज्ञान को आने ही नहीं दे रहे तो अधिकतम
नागरिकों को अंधविश्वास के अंधेरे में धकेल देंगे। देश में वैज्ञानिक सोच को
बढ़ावा देने के लिए हिंदी में उच्च स्तर पर विज्ञान का शिक्षण जरूरी है। वरना देश
को विकसित करने का सपना भूल जाओ। कार्तिक कुमार सैनी
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