बेगैरत - सा पंछी (एक कविता)
बेगैरत-सा पंछी
अभिमानशून्य,
बेगैरत-सा वो पंछी
लौट आता बार बार उसी डाल पर
जिस डाल के अपनों से
धकियाया जाता रहा
लौट आता बार बार उसी
डाल पर
जिस डाल के घोंसले
से गिराया जाता रहा
जबकि खुद के पंख-भी
आए न थे
कौवा-कौवी पाल लेते
होंगे कोयल के
अभिमानशून्य,
बेगैरत-सा वो पंछी,
पुष्पित-पल्लवित
हुआ, घोंसला भी बनाया
और, गैरत ललकारती
रही उसकी
कि न लौट के जा उसी डाल पर
होता रहा अपमानित
बार बार, पर
जन्मस्थली का मोह
छूटा नहीं
अभिमानशून्य,
बेगैरत-सा वो पंछी
मान अपमान सोचता
नहीं कभी
उस डाल के पंछी
ललकारते सभी
हमारे बिना रह नहीं
पाएगा तूं कभी
संगी का भी अपमान
सहता क्या कोई कभी
चुनौती तुम्हारी
स्वीकार है अभी
अकेला ही चलता रहा कब
से, चलूंगा आगे-भी

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