केन्द्र सरकार के कार्यालयों विश्वविद्यालयों कालेजों के लिए आयोजित की जाने वाली हिंदी कार्यशाला के लिए भाषण मैटर / matter for hindi workshop

 

हिंदी का महत्वः- माननीय (कार्यालय अध्यक्ष) तथा अन्य अधिकारीगण! और कार्यालय के मेरे सभी साथियों! आज की हिंदी कार्यशाला में आप  सभी का स्वागत है। हिंदी कार्यशाला का मुख्य विषय हिंदी की मानक वर्तनी/स्टैंडर्ड स्पेलिंग के बारे में है।

 मैं आपको बताना चाहता हूँ कि हिंदी जानने वाले पदधारियों(ओफिशियल्स) के लिए हिंदी कार्यशालाओं का आयोजन, हिंदी में कार्य करने की उनकी झिझक को दूर करने के लिए किया जाता है। आपको पता ही है कि देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को 14 सितम्बर, 1949 को भारत के संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। तो फिर हिंदी में कार्य करने में झिझक क्यूं होती है? इसका एकमात्र कारण है कि हमारे मन में, अपने राष्ट्र और देश के संविधान के प्रति अस्मिता यानी गर्व का भाव नहीं है। हालांकि 26 जनवरी या 15 अगस्त को दिखावे के लिए हम थोड़ा गर्व प्रदर्शित करते हैं। वास्तव में, हम अपने देश के प्रति गर्व को महसूस नहीं करते या फिर जब अपने देश यानि हमवतन लोगों के लिए कार्य करने का समय आता है तो हम अपनी सुविधा का अधिक ख्याल करते हैं। और ये सोचकर कि हिंदी में कार्य करना मुश्किल होगा हम अंग्रेजी में सरकारी काम करते हैं। यानी देश के प्रति गर्व की भावना और आम देशवासियों के प्रति सेवा भाव की जगह अपनी सुविधा ले लेती है। कई तो ये भी पूछ लेते हैं कि इस देश में गर्व करने लायक है ही क्या? ऐसा इसलिए है कि औपनिवेशिक शक्तियों ने हमारे मन-मस्तिष्क में ये जानबूझकर बैठा दिया कि हमारे अपने देश भारत की हर चीज भाषा, संस्कृति, सामान सब घटिया है और उनकी हर चीज उम्दा है। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान ही नहीं, बल्कि आज भी बहुत से लोग अंग्रेजों के राज को बेहतर मानते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसी स्थिति को गुलाम-मानसिकता कहा जाता है।

 हम हिंदी को अभिव्यक्ति का सशक्त साधन मानते हैं। घर और बाजार में इसी को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हैं परन्तु सरकारी कामकाज अंग्रेजी में करते हैं। दरअसल फाइल में पीछे लिखा देखकर, अपने काम को आगे बढ़ाते हैं। कुछ नया करना, कुछ सृजनात्मक या कहें कि क्रियेटिव होने का प्रयास नहीं करते। मैं आपको याद दिला दूँ जब हम अपनी ओर से कुछ सृजनात्मक काम करते हैं तो आपके चेहरे पर चमक शाम तक बनी रहती है और यदि आप रूटिन काम करेंगे तो शाम तक आपका चेहरा सुबह वाली रौनक कायम नहीं रख पाएगा। मेरा कहने का अर्थ है कि पिछला कार्य भले ही अंग्रेजी में हुआ है आप थोड़ी हिम्मत करके उसी काम को अबकी बार हिंदी में करके देखिए, आपको अच्छा महसूस होगा। सारे स्मरण पत्र/रिमाइन्डर, पृष्ठांकन/एनडोर्समैंट, पत्र/लैटर हिंदी में बनाकर भेजो। मंडल कार्यालयों से कोई रिपोर्ट मंगानी हो, सूचना भेजनी हो तो हिंदी में बनाकर भेजो। भाषा बोलचाल की शैली वाली रखो अर्थात् अंग्रेजी के चलन में आ चुके शब्दों से परहेज मत करो।

 तो क्या हिंदी में काम करना कठिन है या हिंदी कठिन है? हाँ है। हिंदी में कम पढ़ा लिखा व्यक्ति काम नहीं कर सकता है। टूटी-फूटी अंग्रेजी से तो कोई भी अपना काम चला लेता है, लेकिन हिंदी में लिखते समय विद्वता की अपेक्षा आपसे की जाती है, इसमें कुछ गलत भी नहीं है क्योंकि ये आपकी अपनी भाषा है। परन्तु अंग्रेजी मिक्सवाली बोलचाल की हिंदी में काम करने की आवश्वयकता है ताकि जिनका हिंदी में हाथ तंग है वो भी हिंदी में लिखे को समझ पाएं। मैं बताना चाहता हूँ – अलग अलग राज्यों या क्षेत्रों में हिंदी के अलग-अलग प्रतीक चिह्न यानि अक्षरों में एकरूपता लाने के लिए सन् 1966 में शिक्षा मंत्रालय द्वारा मानक देवनागरी वर्णमाला प्रकाशित की गई। हिंदी वर्तनी/स्पैलिंग की विभिन्न समस्याओं को दूर करने के लिए, अनेक भाषाविद् ने विचार विमर्श के बाद मानकीकरण किया। यूनिकोड में यदि काम करेंगे तो (मंगल फॉन्ट) में काफी हद तक मानक वर्तनी ही आती है। मानक वर्तनी के लिए आप भारत सरकार द्वारा प्रकाशित प्रशासनिक शब्दावली से भी सहायता ले सकते हैं। 

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