झांसी का किला The Fort of Jhansi (झांसी फोर्ट) भारत का एक स्मारक स्थल

 

झांसी का किला (झांसी फोर्ट) भारत का एक स्मारक स्थल

 इस किले को 17 वीं शताब्दी में राजा बीर सिंह देव द्वारा उत्तर प्रदेश में बंगीरा नामक एक बड़ी पहाड़ी पर बनाया गया था। 1729 में, महाराज छत्रसाल ने मोहम्मद खान बंगश को यह किला मुगल सेना को हराने में उनकी सहायता करने के प्रति अपनी कृतज्ञता के प्रतीक के रूप में दिया था। 1742 में, नरोशंकर को झांसी का सूबेदार नियुक्त किया गया, जिन्होंने न केवल किले का विस्तार किया बल्कि इसमें अन्य भवनों का भी निर्माण करवाया। नरोशंकर के बाद, माधव गोविंद काकिर्डे और बाबूलाल कन्हाई ने झांसी के सूबेदार के रूप में कार्य किया। विश्वास राव लक्ष्मण ने 1766 से 1769 तक कार्य किया, और उसके पश्चात् रघुनाथ राव (द्वितीय) नेवालकर आए, जिन्होंने राज्य के राजस्व में वृद्धि के अलावा महालक्ष्मी मंदिर और रघुनाथ मंदिर का भी निर्माण किया। उनके शासन के पश्चात् रघुनाथ राव (III) ने शासन किया, जिसने झांसी को एक भयानक वित्तीय स्थिति में धकेल दिया। झाँसी को फिर से राजा गंगाधर राव के रूप में एक योग्य प्रशासक मिला, जो अपनी उदारता के कारण स्थानीय प्रजा को संतुष्ट रखने में सफल रहा। उनकी मृत्यु के पश्चात्, उनकी पत्नी, मणिकर्णिका तांबे, ने उनके स्थान पर शासन किया। ये रानी लक्ष्मी बाई के नाम से प्रसिद्ध हैं। अप्रैल 1858 में, ब्रिटिश सेना ने जनरल ह्यू रोज के नेतृत्व में झांसी पर कब्जा कर लिया; ब्रिटिश सरकार ने इसे ग्वालियर के महाराजा को दे दिया और 1868 में इसे वापस ले लिया।

 


                             झांसी के किले की वास्तुकलात्मक विशेषताएं:

   

किले में 10 प्रवेश द्वार हैं - खांडेराव द्वार, दतिया दरवाजा, उन्नाव द्वार, झरणा द्वार, लक्ष्मी द्वार, सागर द्वार, ओरछा द्वार, सैनयार द्वार और चाँद द्वार। प्रवेश द्वार पर भगवान शिव का मंदिर और भगवान गणेश का मंदिर है और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में प्रयोग में लाई गई कड़क बिजली तोप है। स्मारक स्थल के सूचना बोर्ड पर रानी लक्ष्मी बाई द्वारा घोड़े की पीठ पर बैठकर किले से कूद जाने का रोमांचक करतब दर्ज है। यह किला 15 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है और इस अत्यधिक विशाल ढांचे की लंबाई लगभग 312 मीटर और चौड़ाई 225 मीटर है। दो दिशाओं में खंदकों से सुरक्षित की गई विशाल सुदृढ़ दीवार को बाईस खंभों के सहारा देकर सुदृढ़ता प्रदान की गई है। पूर्वी हिस्से की ध्वस्त सुरक्षा-दीवार को अंग्रेजों ने पुनः बनवाया था। जिन्होंने पंचमहल में एक-और मंजिल का भी निर्माण कराया था।

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