अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989
अनुसूचित जाति और अनुसूचित
जनजाति
(अत्याचार निवारण)
अधिनियम, 1989
1989 का संख्याक 33
(यथा-संशोधित)
अनुसूचित जाति और
अनुसूचित जनजाति
(अत्याचार
निवारण) अधिनियम, 1989
1989 का संख्याक
33
(यथा-संशोधित)
(11 सितम्बर, 1989)
अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लोगों
के विरुद्ध किए गए अत्याचारों के अपराधों के निवारण के लिए, इस प्रकार के अपराधों
के मुदकमों के लिए [1](विशेष
न्यायालयों और अनन्य विशेष न्यायालयों) तथा इस प्रकार के अपराधों के पीड़ितों
को राहत देने व पुनर्वास के लिए और उनसे जुड़े अथवा उनसे आनुषंगिक मामलों के लिए
प्रावधान करने हेतु अधिनियम। भारत गणराज्य के चालीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित
रूप से यह अधिनियमित हो :-
अध्याय I
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ – (1) इस अधिनियम
को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 कहा जाएगा।
(2) इसका विस्तार जम्मू और कश्मीर राज्य को
छोड़कर संपूर्ण भारत तक रहेगा।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जिस तारीख[2]
को केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करेगी।
2. परिभाषाएं – इस अधिनियम में,
जब तक की प्रसंगानुकूल अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) ''अत्याचार'' से
धारा 3 के तहत दंडनीय अपराध से अभिप्रेत है;
(ख) ''संहिता'' से
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) से अभिप्रेत है;
[3](खख) ''आश्रित''
का अर्थ पीड़ित के जीवनसाथी, बच्चों, माता-पिता, भाई और बहन से है, जो ऐसे पीड़ित
पर उसकी सहायता और गुजारे के लिए पूरी तरह से अथवा मुख्य रूप से आश्रित हैं;
(ख ग) ''आर्थिक बहिष्कार''
का अर्थ है –
(i) लेन-देन करने, भाड़े पर काम करने अथवा अन्य व्यक्ति के व्यापार करने
से मना करना; अथवा
(ii) सेवाएं प्राप्त करने सहित अवसरों से वंचित करना अथवा दाम के बदले में
सेवाएं प्रदान करने के लिए संविदागत अवसरों से वंचित करना; अथवा
(iii) जिन शर्तों पर सामान्यत: सामान्य
कार्य व्यापार किए जाते हैं, उन शर्तों पर कोई काम करने से इन्कार करना; अथवा
(iv) किसी अन्य व्यक्ति के साथ रखे जाने वाले पेशेवर अथवा व्यावसायिक
संबंध को रखने से परहेज करना;
(खघ) ''अनन्य विशेष
न्यायालय'' का अर्थ इस अधिनियम के तहत अनन्य रूप से अपराधों पर मुकदमा चलाने
हेतु धारा 15 की उप-धारा (1) के तहत स्थापित अनन्य विशेष न्यायालय से है;
(खड.)
''वन
अधिकार'' का अर्थ वही होगा जो इसे अनुसूचित जनजातियां तथा अन्य पारम्परिक वनवासी
(वन अधिकारों को मान्यता) अधिनियम, 2006 (2007 का 2) की धारा 3 की उप-धारा (1)
में नियत किया गया है;
(खज)
''हाथ
से मैला ढोने वाला'' का अर्थ वही होगा जो हाथ से मैला उठाने वालों के रूप में
नियोजन पर प्रतिबंध तथा उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 (2013 का 25) की धारा 2 की
उप-धारा (ण) के खंड (छ) में नियम किया गया है।
(खछ)
''लोक सेवक'' का अर्थ उसी रूप में होगा जिस
प्रकार भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के तहत एक लोक सेवक के रूप में
परिभाषित है, इसके साथ ही कोई अन्य व्यक्ति जो उस समय लागू किसी अन्य कानून के
तहत एक लोक सेवक माना गया हो और केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार, जैसा भी मामला
हो, के तहत अपनी अधिकारिक हैसियत में कार्यरत कोई व्यक्ति भी इसमें शामिल है।
(ग)
''अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों'' का वही अर्थ होगा जो इनके लिए संविधान
के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और खंड (25) में नियत किया गया है;
(घ) ''विशेष न्यायालय'' का अर्थ धारा 14 में विशेष
न्यायालय के रूप में विनिर्दिष्ट एक सत्र न्यायालय से है;
(ड.) ''विशेष लोक अभियोजक'' का अर्थ धारा 15 में
निर्दिष्ट अधिवक्ता अथवा एक विशेष लोक अभियोजक के रूप में विनिर्दिष्ट किसी लोक
अभियोजक से है;
[4](ड.क) ''अनुसूची'' का अर्थ इस अधिनियम के साथ
संलग्न अनुसूची से है;
(ड.ख)
''सामाजिक बहिष्कार'' का अर्थ किसी व्यक्ति
को किसी अन्य व्यक्ति को कोई प्रथागत सेवा प्रदान करने अथवा उससे सेवा प्राप्त
करने नहीं देने अथवा किसी व्यक्ति से रखे जाने वाले सामाजिक संबंध को बनाए रखने
से प्रविरत रहने अथवा उसे अन्यों से विलग करने से है;
(ड.ग) ''पीड़ित'' का अर्थ उस व्यक्ति से है जो धारा
2 की उपधारा (1) के खंड (ग) के तहत ''अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों'' की
परिभाषा में आता हो, तथा जिसने इस अधिनियम के तहत किए गए किसी अपराध के परिणामस्वरूप
उसकी संपत्ति को हुए नुकसान अथवा शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक अथवा
बौद्धिक हानि को झेला अथवा उठाया हो और इसमें उसके संबंधी, कानूनी संरक्षक एवं
कानूनी वारिस शामिल हैं;
(ड.घ)
''साक्षी)''
का अर्थ ऐसे व्यक्ति से है जो इस अधिनियम के तहत किसी अपराध से संबंधित किसी
अपराध कर्म की जांच, छानबीन अथवा मुकदमे के प्रयोजन के संबंध में अत्यावश्यक
ज्ञान रखता है, अथवा उसके पास कोई सूचना हो अथवा तथ्यों तथा परिस्थितियों से
परिचित हो तथा ऐसे केस की जांच, छानबीन अथवा मुकदमे के दौरान जिससे किसी सूचना का
दिया जाना, अथवा बयान दिया जाना अथवा कोई कागजात प्रस्तुत किया जाना हो अथवा किया
जाना अपेक्षित हो और इसमें ऐसे अपराध का पीड़ित सम्मिलित है।
[5](च) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में
प्रयुक्त हैं परंतु परिभाषित नहीं हैं और भारतीय दंड-संहिता (1860 का 45), भारतीय
साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) अथवा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2)
में, परिभाषित है जैसा कि मामला हो, उन अधिनियम में इन्हें जो अर्थ क्रमश: नियत
किए गए हैं, वहीं मान्य होंगे।
(2) इस
अधिनियम में किसी अधिनियमित या उसके किसी उपबंध के प्रति किसी निर्देश का अर्थ
किसी ऐसे क्षेत्र के संबंध में जिसमें ऐसी अधिनियमित या ऐसा उपबंध प्रवृत्त नहीं
है, यह लगाया जाएगा कि वह उस क्षेत्र में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि, यदि कोई हो,
के प्रति निर्देश है।
अध्याय-II
अत्याचार के अपराध
3.
अत्याचार के अपराधों के लिए दंड[6]
– 1(1) कोई भी व्यक्ति, जो अनुसूचित
जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है;
(क)
अनुसूचित जाति या अनुसूचिज जनजाति के
सदस्य को अखाद्य या घृणाजनक पदार्थ पीने या खाने के लिए मजबूर करेगा;
(ख) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य के
परिसर या परिसर से प्रवेश-द्वार पर में मल-मूत्र, कूड़ा, पशु-शव या कोई अन्य
घृणाजनक पदार्थ इकट्ठा करेगा;
(ग) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य के
पास-पड़ास में मल-मूत्र, कूड़ा, पशु-शव या कोई अन्य घृणाजनक पदार्थ इकट्ठा करके
उसे क्षति पहुंचाना, अपमानित करना या क्षुब्ध करना चाहेगा;
(घ) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य
को नग्न अथवा अर्थनग्न करके घुमाना अथवा जूते-चप्पल की माला गले में डालना;
(ड.) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य
के शरीर से बलपूर्वक कपड़े उतारेगा, जबरन सिंह मुंडवाएगा, मूछे हटाएगा, चेहरे या
शरीर को पोतेगा या इसी प्रकार का कोई अन्य कार्य करेगा जो मानवीय सम्मान के लिए
अनादरसूचक हो;
(ण) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य
के स्वामित्वाधीन या उसे आवंटित या किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसे आवंटित किए
जाने के लिए अधिसूचित किसी भूमि को सदोष अधिभोग में लेगा या उस पर खेती करेगा या
उस आवंटित भूमि का अपने नाम अंतरित करा लेगा;
(छ) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी
सदस्य को उसकी भूमि या परिसर से सदोष बैकब्जा करता है अथवा वन अधिकारों सहित,
किसी भूमि या परिसर या जल या सिंचाई की सुविधाओं पर उसके अधिकारों के उपभोग हस्तक्षेप
करता है अथवा फसल को नष्ट करता है या उससे प्राप्त उपज को छीन लेता है;
व्याख्या
:- खंड (ण) तथा इस खंड के प्रयोजनार्थ, शब्द ''सदोष'' में सम्मिलित है –
(क) व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध;
(ख) व्यक्ति की सहमति के बिना;
(ग) व्यक्ति की सहमति के साथ, जबकि ऐसी सहमति को
उस व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति, जिसमें उस व्यक्ति का हित जुड़ा हो, को
जाने से मारने अथवा क्षति पहुंचाने का भय दिखाकर प्राप्त किया गया हो; अथवा
(घ) ऐसी भूमि का जाली अभिलेख तैयार करना;
(ज) अनुसूचित जाति या जनसूचित जनजाति के सदस्य को
''बेगार'' करने अथवा सरकार द्वारा लोक प्रयोजनों के लिए अधिरोपित किसी अनिवार्य
सेवा से भिन्न अन्य समरूप प्रकार के बलाश्रम या बंधुआ मजदूरी के लिए विवश करेगा;
(प) अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति के
किसी व्यक्ति को मानव या पशु के शव ले जाने अथवा फेंककर आने के लिए अथवा कब्र
खोदने के लिए विवश करता है;
(ट) किसी अनुसूचित जाति अथवा किसी अनुसूचित जनजाति
की महिला को देवता, देवमूर्ति, पूज्यनीय वस्तु, मंदिर अथवा अन्य धार्मिक संस्था
को देवदासी अथवा किसी अन्य समान रीति-रिवाज के रूप में समर्पित करने को बढ़ावा
देता या समर्पित करता है अथवा उपर्युक्त कार्यों को करने की अनुमति देता है;
(ठ) किसी अनुसूचित जाति अथवा किसी अनुसूचित जनजाति
के सदस्य को विवश करता है, या अभित्रस्त करता है या रोकता है :-
(क) मतदान न करने अथवा उम्मीदवार विशेष के लिए
मतदान करने हेतु अथवा विधि द्वारा उपबंधित से भिन्न रीति से करने के लिए;
(ख) उम्मीदवारी के लिए नामांकन न भरने हेतु या ऐसे
नामांकन को वापस लेने हेतु; अथवा
(ग) किसी चुनाव में अनुसूचित जाति या अनुसूचित
जनजाति के सदस्य के नामांकन का समर्थन अथवा को प्रस्तावित न करने हेतु;
(ड) अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति के किसी
सदस्य को जो संविधान के भाग- के तहत किसी नगरपालिका या संविधान के भाग- के तहत
किसी पंचायत का एक सदस्य अथवा अध्यक्ष अथवा किसी अन्य कार्यालय का पदधारी हो,
उसे अपने सामान्य कर्तव्यों एवं कार्यों को निष्पादित करने के संबंध में विवश
या अभित्रस्त या बाधित करता है;
(ढ) मतदान के पश्चात, अनुसूचित जाति या अनुसूचित
जनजाति के किसी सदस्य को चोठ पहुंचाता है या घोर कष्ट देता है या प्रहार करता है
या सामाजिक अथवा आर्थिक बहिष्कार को अधिरोपित करता है या अधिरोपित करने की धमकी
देता है अथवा उसे मिलने वाली किसी लोक सेवा के लाभ उठाने से रोकता है;
(ण) किसी उम्मीदवार विशेष के पक्ष में मतदान करने
या न करने के लिए अथवा विधि द्वारा उपबंधित रीति से मतदान करने के लिए किसी
अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन कोई
अपराध करता है;
(त) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी
सदस्य के विरुद्ध मिथ्या, द्वेषपूर्ण या तंग करने वाला वाद या दांडिक या अन्य
विधिक कार्यवाही संस्थित करता है;
(थ) किसी लोक सेवक को मिथ्या या तुच्छ जानकारी
देकर उसके द्वारा अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को क्षति
पहुंचाने या क्षुब्ध करने के लिए ऐसे लोक सेवक से उसकी विधिपूर्ण शक्ति का
प्रयोग कराएगा;
(द) जनता को दृष्टिगोचर किसी स्थान में अनुसूचित
जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य का अपमान करने के अशय से साशय उसको अपमानित
या अभित्रस्त करता है;
(ध) जनता को दृष्टिगोचर किसी स्थान में अनुसूचित
जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को जाति का नाम लेकर अपशब्द बोलता है;
(न) अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के
सदस्यों द्वारा सामान्यतया पवित्र वस्तु अथवा सर्वेच्च श्रद्धा की वस्तु के
रूप में ज्ञात किसी वस्तु को नष्ट करता है, क्षति पहुंचाता है अथवा अपवित्र करता
है;
व्याख्या : इस खंड के
प्रयोजनों से, शब्द ''वस्तु'' का अर्थ है और इसमें शामिल है मूर्ति, छायाचित्र
तथा चित्र;
(प) अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के
सदस्यों के विरुद्ध बोले गए या लिखित शब्दों द्वारा अथवा संकेतों के माध्यम से
अथवा दृश्यमान निरुपण के द्वारा अथवा अन्यथा उन्मूलन, घृणा या दुर्भावना को
बढ़ावा देने का प्रयास करता है या बढ़ावा देता है;
(फ) अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के
सदस्यों द्वारा अत्यधिक श्रद्धा के पात्र किसी स्वर्गीय व्यक्ति का अनादर
लिखित या बोले गए शब्दों द्वारा अथवा किसी अन्य माध्यम से करता है;
(ब) (i) यह जानते हुए कि वह अनुसूचित
जाति या अनुसूचित जनजाति की महिला है, किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति को
महिला को जानबूझकर छूता है, जब यह स्पृशों यौन प्रकृति का है और छुए जाने वाले की
सहमति नहीं है;
(ii) यह जानते हुए कि महिला अनुसूचित जाति या
अनुसूचित जनजाति से संबंध है, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित महिला
के प्रति यौन प्रकृति के शब्दों, कृत्यों अथवा हाव-भावों का इस्तेमाल करता है;
व्याख्या
: उप-खंड (1) के प्रयोजनार्थ, शब्द ''सहमति'' का अर्थ एक स्पष्ट स्वैच्छिक
समझौते से है जब व्यक्ति शब्दिक, हाव-भावों अथवा किसी गैर-मौखिक संचार के किसी
रूप में, किसी कार्य-विशेष में भागीदार होने की इच्छा को प्रकट करता है;
बशर्ते
कि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित महिला जो किसी यौन प्रकृति के
कार्य का शारीरिक विरोध नहीं करती है तो केवल इसी कारण के तथ्य से यौन गतिविधि के
प्रति सहमति नहीं मानी जाएगी;
और
बशर्ते कि अपराधी सहित, किसी के भी साथ महिला के यौन इतिहास में सहमति या अपराध
में कमी को निहित नहीं माना जाएगा।
(भ) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों
द्वारा सामान्यतया उपयोग में लाए जाने वाले किसी झरने, जलाशय या किसी अन्य स्रोत
के जल को दृष्टित या गंदा करता है जिससे कि वह जिस प्रयोजन के लिए सामान्यतया
उपयोग उपयोग किया जाता है, उसके लिए यह उपयुक्त नहीं रहेगा;
(म) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी
सदस्य को सार्वजनिक अभिगम के स्थान के मार्ग के किसी रूढ़िजन्य अधिकार से वंचित
करेगा या ऐसे सदस्य को बाधा पहुंचाएगा जिससे कि ऐसे सार्वजनिक अभिगम के स्थान का
उपयोग करने या वहां पहुंचने से निवारित हो जाए जहां जनता के अन्य सदस्यों या
उसके किसी भाग को उपयोग करने का या पहुंचने का अधिकार है;
(य) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी
सदस्य को अपना मकान, गांव या अन्य निवास स्थान छोड़ने के लिए विवश करता है या
ऐसा करने का कारण बनता है;
बशर्ते
कि इस खंड में शामिल कुछ भी सरकारी कर्तव्य को निभाने के लिए किए गए किसी कार्य
पर लागू नहीं होगा;
(य.क.) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को
किसी भी प्रकार से निम्नलिखित के संबंध में बाधित करना या रोकता है –
(क) किसी
क्षेत्र के सामान्य संपदा संसाधनों या कब्रिस्तान या श्मशान भूमि को अन्यों के
साथ समान रूप से इस्तेमाल करने से अथवा किसी नदी, नाले, झरने, कुंए, तालाब, टंकी,
पानी के नल या पानी इस्तेमाल करने के अन्य स्थान या किसी स्नान घाट, अन्य
सार्वजनिक सवारी, किसी मार्ग या राह का उपयोग करने से;
(ख) सार्वजनिक
स्थानों पर साईकिलों या मोटर साईकिलों पर बैठने या सवारी करने से या जूते-चप्पलें
या नए वस्त्र धारण करने से या विवाह की बरात निकालने या विवाह की बारातों के
दौरान घोड़े अथवा किसी अन्य वाहन पर चढ़ने से;
(ग) किसी ऐसे पूज्यनीय स्थल में प्रवेश करने से,
जो जनता या समान धर्म का पालन करने वाले अन्य लोगों के लिए खुला है अथवा जात्राओं
सहित किसी धार्मिक, सामाजिक या सांस्कृतिक जुलूसों को निकालने या इनमें हिस्सा
लेने से;
(घ) किसी शिक्षा संस्थान, अस्पताल, औषधालय,
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, दुकान या सार्वजनिक मनोरंजन स्थल या किसी अन्य
सार्वजनिक स्थल में प्रवेश करने से; अथवा जनता के लिए खुले किसी स्थल में जनता
के उपयोग से संबंधित किन्हीं वस्तुओं या बरतनों के इस्तेमाल से; अथवा
(ड.) जनता के अन्य सदस्यों, या इसके अन्य वर्गों
को जिन पेशागत कार्यों को पेशे के रूप में अपनानो या किसी धंधे, व्यापार या व्यवसाय
या किसी प्रकार की नौकरी को रोजगार के लिए प्रयोग करने का अधिकार है अथवा सुलभ है
उसे करने से;
(म.ख.) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को
जादू-टोना करने या डायन होने के आरोप में शारीरिक या मानसिक यंत्रणा देने का
निमित्त बनता है; अथवा
(य.ग.) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति,
परिवार या समूह के सामाजिक या आर्थिक बहिष्कार की धमकी देता या अधिरोपित करता है;
तो वह, कारावास से, जिसकी
अवधि छह मास से कम नहीं होगी किन्तु जो पांच वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने
से, दंडनीय होगा।]
(2) कोई व्यक्ति, जो
अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है :-
(i) मिथ्या साक्ष्य देगा या गढ़ेगा जिससे उसका आशय अनुसूचित जाति या
अनुसूचित जनजातिया के किसी सदस्य को किसी ऐसे अपराध के लिए जो तत्समय प्रवृत्त
विधि द्वारा मृत्यु दंड से दंडनीय है दोषसिद्ध कराना है या वह यह जानता है कि
इससे उसका दोषसिद्ध होना संभाव्य है, वह आजीवन कारावास से और जुर्मने से दंडनीय
होगा; और यदि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी निर्दोष सदस्य को ऐसे
मिथ्या या गढ़े हुए साक्ष्य के फलस्वरूप दोषसिद्ध किया जाता है और फांसी दी
जाती है वह व्यक्ति, जो ऐसा मिथ्या साक्ष्य देता है या गढ़ता है, मृत्यु दंड
से दंडनीय होगा;
(ii) मिथ्या साक्ष्य देगा या गढ़ेगा
जिससे उसका आशय अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को ऐसे अपराध के
लिए जो मृत्यु दंड से दंडनीय नहीं है किन्तु सात वर्ष या उससे अधिक की अवधि के
कारावास से दंडनीय है, दोषसिद्ध कराना है वह यह जानता है कि उससे उसका दोषसिद्ध
होना संभाव्य है, वह कारवास से, जिसकी अवधि छह मास से कम की नहीं होगी किन्तु जो
सात वर्ष या उससे अधिक की हो सकेगी और जुर्माने से दंडनीय होगा;
(iii) अग्रि या किसी विस्फोटक पदार्थ
द्वारा रिष्टि करेगा जिससे उसका आशय अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी
सदस्य की किसी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना है या वह यह जानता है कि उससे ऐसा होना
संभाव्य है वह कारावास से जिसकी अवधि छह मास से कम नहीं होगी किन्तु जो सात वर्ष
तक की हो सकेगी, और जुर्माने से दंडनीय होगा;
(iv) अग्रि या किसी विस्फोटक पदार्थ
द्वारा रिष्टि करेगा जिससे उसका आशय किसी ऐसे भवन को जो अनुसूचित जाति या
अनुसूचिज जनजाति के किसी सदस्य द्वारा साधारणत: पूंजी के स्थान के रूप में या
मानव आवास के स्थान के रूप में या संपत्ति की अभिरक्षा के लिए किसी स्थान के रूप
में उपयोग किया जाता है, नष्ट करता है या वह यह जानता है कि उससे ऐसा होना संभाव्य
है, वह आजीवन कारावास से और जुर्मने से दंडनीय होगा;
(v) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45)
के अधीन दस वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय कोई अपराध किसी व्यक्ति
या संपत्ति के विरुद्ध करेगा[7]
(यह जानते हुए कि सदस्य की है) वह आजीवन कारावास से, और जुर्माने से, दंडनीय
होगा;
[8][(vक) यह जानते हुए कि वह व्यक्ति
अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है या वह संपत्ति ऐसे सदस्य से
संबंधित है, किसी व्यक्ति या संपत्ति के निरुद्ध अनुसूची में विनिर्दिष्ट अपराध
को अंजाम देगा, वह इस प्रकार के अपराधों के लिए एवं जुर्माने के लिए भी भारतीय दंड
संहिता (1860 का 45) के तहत विनिर्दिष्ट दंड के लिए दंडनीय होगा;]
(vi) यह जानते हुए या यह विश्वास करने
का कारण रखते हुए कि इस अध्याय के अधीन कोई अपराध किया गया है; यह अपराध किए जाने
के किसी साक्ष्य को, अपराधी को विधिक दंड से बचाने के आशय से गायब करेगा या उस
आशय से अपराध के बारे में कोई ऐसी जानकारी देगा जो वह जानता है या विश्वास करता
है कि वह मिथ्या है, वह उस अपराध के लिए उपबंधित दंड से दंडनीय होगा; या
(vii) लोक सेवक होते हुए इस धारा के
अधीन कोई अपराध करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु
जो उस अपराध के लिए उपबंधित दंड तक हो सकेगी, दंडनीय होगी।
[9][4. कर्तव्यों की उपेक्षा के लिए दंड : (1) कोई भी लोक सेवक जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं
है, इस अधिनियम तथा इसके तहत बनाए गए नियमों के अधीन उसके द्वारा पालन किए जाने के
लिए अपेक्षित अपने कर्तव्यों की जानबूझकर उपेक्षा करेगा, वह कारावास से जिसकी
अवधि छह मास से कम की नहीं होगी किन्तु जो एक वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा।
(2) उप-धारा (1) में
संदर्भित लोक सेवक के कर्तव्यों में सम्मिलित रहेगा -
(क) ज्ञापक के हस्ताक्षर
लेने से पूर्व, पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी द्वारा मौखिक रूप से दी गई सूचना को
लिखित रूप में दर्ज करने के पश्चात ज्ञापक को पढ़कर सुनाना;
(ख) इस अधिनियम तथा अन्य संगत प्रावधानों के तहत
प्रथम सूचना रिपोर्ट या एक शिकायत को दर्ज करना और इस अधिनियम की उपयुक्त धाराओं
के तहत इसे पंजीकृत करना;
(ग)
इस प्रकार पंजीकृत सूचना की एक प्रति तत्काल
ज्ञापक को सौंपना;
(घ)
पीड़ितों या साक्षियों के बयान दर्ज करना;
(ड.)
छानबीन करना और विशेष न्यायालय या अनन्य विशेष न्यायालय में आरोप-पत्र साठ
दिनों की अवधि के भीतर दाखिल करना, और यदि कोई विलंब हो तो लिखित में स्पष्टीकरण
देना;
(च) किसी दस्तावेज अथवा इलैक्ट्रॉनिक अभिलेख को
सही तरीके से तैयार करना, रचना तथा अनुवाद करना;
(छ)
इस अधिनियम अथवा उसके तहत निर्मित नियमों में विनिर्दिष्ट किसी अन्य कर्तव्य को
निष्पादित करना -
बशर्ते
कि लोक सेवक के विरुद्ध इस संबंध में आरोपों को एक प्रशासनिक जांच की संस्तुतियों
के आधार पर निर्धारित किया गया हो।
(3) उप-धारा (2) में वर्णित कर्तव्य की किसी लोक
सेवक द्वारा की गई किसी अवहेलना के संबंध में संज्ञान विशेष न्यायालय या अनन्य
विशेष न्यायालय द्वारा लिया जाएगा तथा ऐसे लोक सेवक के विरुद्ध दांडिक
कार्यवाहियों के संबंध में निदेश देगा।]
5. पश्चावर्ती
दोषसिद्धि के लिए वर्धित दंड : कोई व्यक्ति जो इस अध्याय के अधीन किसी
अपराध के लिए पहले ही दोषसिद्ध हो चुकी है, दूसरे अपराध या दूसरे अपराध के पश्चापवर्ती
किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जाता है कि वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष से
कम की नहीं होगी किन्तु जो उस अपराध के लिए उपबंधित अवधि तक बढ़ायी जा सकेगी,
दंडनीय होगा।
6. भारतीय
दंड संहिता के कतिपय उपबंधों का लागू होना : इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के
अधीन रहते हएु, भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 34, अध्याय 3,
अध्याय 4, अध्याय 5, अध्याय 5क, धारा 149 और अध्याय 23 के उपबंध, जहां तक हो
सके, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे भारतीय
दंड संहिता के प्रयोजनों के लिए लागू होते हैं।
7. कतिपय
व्यक्तियों की संपत्ति का समपहरण : (1) जहां कोई व्यक्ति इस अध्याय के
अधीन दंडनीय किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है वहां विशेष न्यायालय, कोई
दंड के अतिरिक्त, लिखित रूप में आदेश द्वारा यह घोषित कर सकेगा कि उस व्यक्ति
की कोई संपत्ति स्थावर या जंगम, या दोनों जिनका उस अपराध को करने में प्रयोग किया
गया है सरकार को जब्त हो जाएगी। (2) जहां कोई व्यक्ति इस अध्याय के अधीन किसी
अपराध का अभियुक्त है, वहां उसका विचारण करने वाला विशेष न्यायालय ऐसा आदेश करने
के लिए स्वतंत्र होगा कि उसकी सभी या कोई संपत्ति, - स्थावर या जंगम या दोनों,
ऐसे विचारण की अवधि के दौरान, कुर्क की जाएगी और जहां ऐसे विचारण का परिणाम दोषसिद्ध
है वहां इस प्रकार कुर्क की गई संपत्ति उस सीमा तक समपहरण के दायित्वाधीन होगी
जहां तक वह इस अध्याय के अधीन अधिरोपित किसी जुर्माने की वसूली के प्रयोजन के लिए
अपेक्षित है।
8. अपराधों
के बारे में उपधारणा : इस अध्याय के अधीन किसी अपराध के लिए अभियोजन में, यदि
यह साबित हो जाता है कि –
(क) अभियुक्ति ने इस अध्याय के अधीन [10]अपराध
करने के लिए अभियुक्त व्यक्ति द्वारा किए गए अपराधों के संबंध में कोई वित्तीय
सहायता की है या अपराध किए जाने के लिए पर्याप्त रूप से संदेहास्पाद है तो विशेष
न्यायालय, जब तक कि तत्प्रतिकूल साबित न किया जाए, या उपधारणा करेगा कि ऐसे व्यक्ति
ने उस अपराध का दुरूप्रेरण किया है;
(ख) व्यक्तियों के किसी समूह ने इस अध्याय के
अधीन अपराध किया है और यह साबित हो जाता है कि किया गया अपराध भूमि या किसी अन्य
विषय के बारे में किसी विद्यमान विवाद का फल है तो यह उपधारणा की जाएगी कि यह
अपराध सामान्य आशय या सामान्य उद्देश्य को अग्रसर करने के लिए किया गया था।
[11](ग) अभियुक्त पीड़ित
या उसके परिवार को निजी तौर पर जनता या तो न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि अभियुक्त
को पीड़ित की जातिगत या जनजातीय पहचान का ज्ञान था, जब तक कि तत्प्रतिकूल साबित न
हो जाए।]
9. शक्तियों का प्रदान किया जाना : (1)
संहिता में या इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में किसी बात के होते हुए भी, यदि
राज्य सरकार ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझती है, तो वह -
(क) इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के निवारण के
लिए और उससे निपटने के लिए या
(ख) इस अधिनियम के अधीन किसी मामले या मामलों के वर्ग या समूह
के लिए,
किसी जिले या उसके किसी भाग में, राज्य सरकार के किसी अधिाकरी
को राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे जिले या उसके भाग में संहिता के अधीन पुलिस
अधिकारी द्वारा प्रयोक्तव्य शक्तियों या, यथा स्थिति, ऐसे मामले या मामलों के
वर्ग या समूह के लिए, और विशिष्टतया किसी विशेष न्यायालय के समक्ष व्यक्तियों
की गिरफ्तारी, अन्वेषण और अभियोजन की शक्तियां प्रदान कर सकेगी।
(2) पुलिस के सभी अधिकारी और सरकार के अन्य सभी
अधिकारी इस अधिनियम के या उनके अधीन बनाए गए किसी नियम, स्कीम या आदेश के उपबंधों
के निष्पादन में उपधारा (1) में निर्दिष्ट अधिकारी की सहायता करेंगे।
(3) संहिता के उपबंध, जहां तक हो सके, उपधारा (1)
के अधीन किसी अधिकारी द्वारा शक्तियों के प्रयोग के संबंध में लागू होंगे।
अध्याय-III
निष्कासन
10.
ऐसे व्यक्ति का हटाया जाना जिसके द्वारा अपराध किए जाने की संभावना है : (1)
जहां विशेष न्यायालय का परिवाद या पुलिस रिपोर्ट पर, यह समाधान हो जाता है कि
संभाव्यता है कि कोई व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 244 में यथानिर्दिष्ट
''अनुसूचित क्षेत्रों'' या ''जनजाति क्षेत्रों'' में सम्मिलित किसी क्षेत्र में [12][या
धारा 21 की उपधारा (2) के खंड (vii) के उपबंधों के तहत चिह्नित किसी क्षेत्र
में] इस अधिनियम के अध्याय 2 के अधीन कोई
अपराध करेगा वहां वह, लिखित आदेश द्वारा, ऐसे व्यक्ति को यह निदेश दे सकेगा कि
वह ऐसे क्षेत्र की सीमाओं से परे, ऐसे मार्ग से होकर और इतने समय के भीतर हट जाए,
जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए गए, और [13](तीन वर्ष)
से अनधिक ऐसी अवधि के लिए जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, उस क्षेत्र में जिससे
हट जाने का उसे निदेश दिया गया था, वापस न लौटै।
(2) विशेष न्यायालय, उपधारा (1) के
अधीन आदेश के साथ उस उपधारा के अधीन निर्दिष्ट व्यक्ति को वे आधार संसूचित
करेगा जिन पर वह आदेश किया गया है।
(3) विशेष न्यायालय, उस
व्यक्ति द्वारा जिसके विरुद्ध ऐसा आदेश किया गया है, या उसकी ओर से किसी अन्य
व्यक्ति द्वारा आदेश की तारीख से तीस दिन के भीतर किए गए अभ्यावेदन पर ऐसे
कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे उपधारा (1) के अधीन किए गए आदेश को प्रतिसंहृत या
उपांतरित कर सकेगा।
11. किसी व्यक्ति द्वारा संबंधित क्षेत्र से स्वयं
हटने में असफल रहने और वहां से निष्कासित होने के पश्चात उसमें प्रवेश करने की
दशा में प्रक्रिया : (1) यदि कोई व्यक्ति जिसको धारा 10 के अधीन किसी
क्षेत्र से हट जाने के लिए कोई निदेश जारी किया गया है –
(क) निदेश किए गए रूप में हटने में असफल रहता है,
या
(ख) इस प्रकार हटने के पश्चात उपधारा (2) के अधीन
विशेष न्यायालय की लिखित अनुज्ञा के बिना उस क्षेत्र में ऐसे आदेश में विनिर्दिष्ट
अवधि के भीतर प्रवेश करता है, तो विशेष न्यायालय उसे गिरफ्तार करा सकेगा और उस
क्षेत्र के बाहर ऐसे स्थान पर, जो विशेष न्यायालय विनिर्दिष्ट करे, पुलिस
अभिरक्षा में निष्कासित कर सकेगा।
(2) विशेष न्यायालय लिखित आदेश द्वारा किसी
ऐसे व्यक्ति को जिसके विरुद्ध धारा 10 के अधीन आदेश दिया गया है अनुज्ञा दे
सकेगा कि वह उस क्षेत्र में जहां से हट जाने का उसे निदेश दिया गया था ऐसी अस्थायी
अवधि के लिए और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो ऐसे आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए
लौट सकता है और अधिरोपित शर्तों के सम्यक् अनुपालन के लिए उससे अपेक्षा कर सकेगा
कि वह प्रतिभू सहित या उसके बिना बंधपत्र निष्पादित करें।
(3)
विशेष न्यायालय किसी
भी समय ऐसी अनुज्ञा को प्रतिसंहृत कर सकेगा।
(4)
ऐसा
व्यक्ति जो ऐसी अनुज्ञा से उस क्षेत्र में वापस आता है जिससे उसे हटने के लिए
निदेश दिया गया था, अधिरोपित शर्तों का पालन करेगा और जिस अस्थायी अवधि के लिए
लौटने की उसे अनुज्ञा दी गई थी उसके अवसान पर या ऐसी अस्थायी अवधि के अवसान के
पूर्व ऐसी अनुज्ञा के प्रतिसंहृत किए जाने पर ऐसे क्षेत्र से बाहर हट जाएगा और
धारा 10 के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि के अनवसित भाग के भीतर नई अनुज्ञा के बिना वहां
नहीं लौटेगा।
(5)
यदि कोई व्यक्ति अधिरोपित शर्तों में से किसी
का पालन करने में या तद्नुसार स्वयं को हटाने में असफल रहेगा या इस प्रकार हट
जाने के पश्चात ऐसे क्षेत्र में नई अनुज्ञा के बिना प्रवेश करेगा या लौटेगा तो
विशेष न्यायालय उसे गिरफ्तार करा सकेगा और उसे उस क्षेत्र के बाहर ऐसे स्थान पर,
जो विशेष न्यायालय विनिर्दिष्ट करे, पुलिस अभिरक्षा में निष्कासित कर सकेगा।
12. ऐसे व्यक्तियों के, जिनके
विरुद्ध धारा 10 के अधीन आदेश किया गया है, माप और फोटो आदि लेना : (1) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जिसके विरुद्ध धारा
10 के अधीन आदेश दिया गया है, विशेष न्यायालय द्वारा ऐसी अपेक्षा किए जाने पर,
कसिी पुलिस अधिकारी को अपने माप और फोटो लेने देगा।
(2) यदि
उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट कोई व्यक्ति, जिससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह
अपने माप या फोटो लेने दे, इस प्रकार माप या फोटो किए जाने का प्रतिरोध करता है,
या उससे इंकार करता है तो यह विधिपूर्ण होगा कि माप या फोटो लिए जाने को सुनिश्चित
करने के लिए सभी आवश्यक उपाय किए जाएं।
(3) उपधारा (2) के अधीन
लिए जाने वाले माप या फोटो का प्रतिरोध या उससे इंकार करने को भारतीय दंड संहिता,
(1860 का 45) की धारा 186 के अधीन अपराध समझा जाएगा।
(4)
जहां धारा 10 के अधीन किया गया आदेश प्रतिसंहृत कर दिया जाता है वहां
उपधारा (2) के अधीन लिए गए सभी माप और फोटो (जिसके अंतर्गत नेगेटिव भी हैं) नष्ट
कर दिए जाएंगे या उस व्यक्ति को सौंप दिए जाएंगे जिसके विरुद्ध आदेश किया गया
था।
13.
धारा 10 के अधीन आदेश के अनुपालन के लिए शास्ति : वह व्यक्ति, जो धारा
10 के अधीन किए गए विशेष न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करेगा। कारावास से, जिसकी
अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से दंडनीय होगा।
अध्याय-IV
विशेष न्यायालय
[14]14. विशेष न्यायालय
तथा अनन्य विशेष न्यायालय : (1) राज्य सरकार, शीघ्र विचारण का उपबंध करने के
प्रयोजन के लिए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की सहमति से, राजपत्र में
अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के अधीन अपराधों का विचारण करने के लिए एक या अधिक
जिलों के लिए एक अनन्य विशेष न्यायालय स्थापित करेगी :
उपबंध
के साथ कि राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की सहमति से,
राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के तहत केसों की संख्या जिन जिलों में
कम दर्ज की जाएगी। उन जिलों के लिए, इस अधिनियम के तहत अपराधों के मुकदमों हेतु
सशन्स न्यायालय को विशेष न्यायालय होने के लिए विनिर्दिष्ट करेगी :
आगे इस उपबंध के साथ कि इस प्रकार से स्थापित या
विनिर्दिष्ट न्यायालयों के पास इस अधिनियम के तहत अपराधों का सीधे संज्ञान लेने
की शक्तियां रहेंगी।
(2) जहां तक संभव हो सके, इस अधिनियम के तहत केसों
का निपटान दो मास की अवधि के भीतर करना सुनिश्चित करने हेतु पर्याप्त संख्या
में न्यायालयों की स्थापना करना राज्य सरकार का कर्तव्य होगा।
(3) विशेष न्यायालय अथवा अनन्य विशेष न्यायालय
के प्रत्येक मुकदमे की कार्यवाही तब तक दिन प्रतिदिन जारी रहेगी जब तक कि हाजिर
सभी साक्षियों का परीक्षण नहीं कर लिया जाता, जब तक कि विशेष न्यायालय या अनन्य
विशेष न्यायालय लिखित में दर्ज करते हुए किसी कारण से अगले दिन से आगे के लिए इसे
स्थापित रखने हेतु आवश्यक न मान ले :
इस
उपबंध के साथ कि जब मुकदमे का संबंध इस अधिनियम के तहत किसी अपराध से हो तो
मुकदमा, जहां तक संभव हो, आरोप-पत्र दाखिल किए जाने की दिनांक से दो माह की अवधि
के भीतर पूरा किया जाएगा।]
[15][14क. अपीलें
: (1) दंड प्रक्रिया की संहिता, 1973 (1974 का 2) में चाहे कुछ भी समाहित हो,
एक अपील, विशेष न्यायालय अथवा अनन्य विशेष न्यायालय के वादकालीन आदेश न होकर,
तथ्यों व विधि दोनों के आधार पर न्यायनिर्णय, दंड या आदेश के संबंध में अपील उच्च
न्यायालय में स्वीकार्य होगी।
(2) दंड प्रक्रिया की संहिता, 1973 (1974 का 2) की
धारा 378 की उपधारा (2) में चाहे कुछ भी समाहित हो, जमानत प्रदान करने अथवा अस्वीकृत
करने संबंधी विशेष न्यायालय या अनन्य विशेष न्यायालय के आदेश के विरुद्ध उच्च
न्यायालय में अपील स्वीकार्य होगी।
(3) चाहे इस समय लागू किसी अन्य विधि में कुछ भी
समाहित हो, इस धारा के अधीन प्रत्येक अपील को न्यायनिर्णय, दंड अथवा अपीलीय आदेश
की दिनांक से नब्बे दिनों की अवधि के भीतर दायर कर दी जाएगी।
इस
उपबंध के साथ कि उच्च न्यायालय चाहे तो नब्बे दिनों की अवधि समाप्त होने के
पश्चात् किसी अपील को विचारार्थ स्वीकार कर सकती है यदि इसका समाधान हो जाता है
कि अपीलकर्ता के पास नब्बे दिनों की अवधि के भीतर अपील दायर न करने का पर्याप्त
कारण था :
आगे
इस उपबंध के साथ कि एक सौ अस्सी दिन की अवधि समाप्त होने के पश्चात् कोई अपील
विचारार्थ स्वीकार नहीं की जाएगी।
(4) उपधारा (1) के अधीन जमा की गई प्रत्येक अपील
को यथासंभव, जमा किए जाने की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर निपटा दिया जाएगा।
[16][15.
विशेष लोक अभियोजक और अनन्य लोक अभियोजक : (1) राज्य
सरकार, प्रत्येक विशेष न्यायालय के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक लोक
अभियोजक विनिर्दिष्ट करेगी या किसी ऐसे अधिवक्ता को, जिसने कम से कम सात वर्ष तक
अधिवक्ता के रूप में विधि-व्यवसाय किया हो, उस न्यायालय में मामलों के संचालन
के प्रयोजन के लिए विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त करेगी।
(2) राज्य सरकार, प्रत्येक अनन्य विशेष न्यायालय
के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक अनन्य विशेष लोक अभियोजक विनिर्दिष्ट
करेगी या किसी ऐसे अधिवक्ता को, जिसने कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता के तौर पर
विधि-व्यवसाय किया हो, उस न्यायालय में मामलों के संचालन के प्रयोजन के लिए अनन्य
विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त करेगी।]
[17][अध्याय-IVक
पीड़तों व साक्षियों के अधिकार
15क. पीड़ितों व साक्षियों के अधिकार –
(1) किसी भी प्रकार के अभित्रास या दबाव या प्रलोभन या हिंसा अथवा हिंसा की धमकी
के विरुद्ध पीड़ितों, उनके आश्रितों और साक्षियों को सुरक्षा प्रदान के संबंध में व्यवस्था
करने का कर्तव्य और उत्तरदायित्व राज्य का होगा।
(2) पीड़ित के साथ व्यवहार पक्षपात रहित, मान व
सम्मान सहित और पीड़ित की आयु या लिंग या शैक्षणिक कमी या निर्धनता के कारण उत्पन्न
होने वाली किसी विशेष आवश्यकता के अनुसार किया जाएगा।
(3)
पीड़ित अथवा उसके आश्रितों को किसी
प्रकार की जमानत संबंधी कार्यवाहियों सहित न्यायालय की किसी भी कार्यवाहियों की
पर्याप्त, सटीक और सामयिक सूचना पाने का अधिकार होगा और विशेष लोक अभियोजक अथवा
राज्य सरकार पीड़ितम को इस अधिनियम के तहत किसी प्रकार की कार्यवाहियों के बारे
में सूचित करेगी।
(4) पीड़ित अथवा उसके आश्रितों को विशेष न्यायालय
या अनन्य विशेष न्यायालय, जैसा भी मामला हो, को किसी दस्तावेज या सामग्री,
साक्षी को प्रस्तुत करने के लिए या उपस्थित व्यक्तियों के परीक्षण के लिए
पक्षकारों को सम्मन करने हेतु आवेदन देने का अधिकार होगा।
(5) पीड़ित या उसके आश्रितों को किसी अभियुक्त
की जमानत, आरोपमुक्ति, रिहाई, पैरोल, दोषसिद्धि या दंड दिए जाने से संबंधित इस
अधिनियम के तहत किसी प्रकार की कार्यवाहियों अथवा इससे जुड़ी किसी प्रकार की
कार्यवाहियों या बहसों को सुने जाने अथवा दोषसिद्धि, दोषमुक्त या दंड सुनाए जाने
के विषय पर लिखित निवेदन दाखिल करने का हक होगा।
(6) दंड प्रक्रिया की संहिता, 1973 (1974 का 2) में
चाहे कुछ भी समाहित हो, इस अधिनियम के तहत केस का परीक्षण कर रहे विशेष न्यायालय
या अनन्य विशेष न्यायालय पीड़ित, उसके आश्रित,, मुखबिर या साक्षियों को निम्नलिखित
उपलब्ध कराएगा :
(क) न्याय के अंतिकम उद्देश्यों को हासिल करने
हेतु संपूर्ण सुरक्षा;
(ख) जांच, छानबीन और मुकदमे के दौरान परिवहन तथा
गुजारे का खर्चा;
(ग) जांच, छानबीन और मुकदमे के दौरान सामाजिक-आर्थिक
पुनर्वास; और
(घ) स्थान परिवर्तन।
(7) राज्य संबंधित विशेष न्यायालय तथा अनन्य
विशेष न्यायालय को किसी पीड़ित या उसके आश्रित, मुखबिर या गवाहों को प्रदान की गई
सुरक्षा के बारे में सूचित करेगा तथा ऐसा न्यायालय प्रदान की जा रही सुरक्षा की
आवधिक समीक्षा करेगा और उचित आदेश पारित करेगा।
(8) संबंधित विशेष न्यायालय अथवा अनन्य विशेष न्यायालय,
उपधारा (6) के प्रावधानों की व्यापकता के संबंध में बिना किसी पक्षपात के, पीड़ित
या उसके आश्रित, मुखबिर या गवाहों के द्वारा किसी कार्यवाहियों के दौरान इसके समक्ष
या ऐसे पीड़ित मुखबिर या गवाहों के संबंध में विशेष लोक अभियोजक द्वारा प्रस्तुत
की गई अर्जी के आधार पर अथवा इसके स्वयं के प्रावेदन के आधार पर निम्नलिखित उपाय
कर सकता है :-
(क) अपने आदेशों या न्यायनिर्णयों या जनता की
पहुंच में उपलब्ध केस से संबंधित किसी अभिलेख में साक्षियों के नामों तथा पतों को
गुप्त रखना;
(ख) साक्षियों की पहचान तथा पतों उजागर न करने के
संबंध में निदेश जारी करना;
(ग) पीड़ित, मुखबिर या साक्षी के उत्पीड़न से
संबंधित किसी भी शिकायत के संबंध में तत्काल कार्रवाई करना तथा यदि आवश्यक हो तो
उसी दिन सुरक्षा के संबंध में उचित आदेश पारित करना :
इस
उपबंध के साथ कि खंड (ग) के तहत प्राप्त शिकायत की जांच या छानबीन का परीक्षण ऐसे
न्यायालय द्वारा मुख्य केस से अलग तौर पर किया जाएगा और इस शिकायत की प्राप्ति
की तारीख से दो माह की अवधि के भीतर निर्णय दिया जाएगा :
आगे
और उपबंध के साथ कि जहां खंड (ग) के तहत शिकायत लोक सेवक के विरुद्ध होगी वहां न्यायालय
ऐसे लोक सेवक पर पीड़ित, मुखबिर या साक्षी जैसा भी मामला हो, लंबित केस से संबंधित
या असंबंधित किसी भी मामले में, न्यायालय की अनुमति के साथ किए जाने वाले को
छोड़कर, हस्तक्षेप करने पर रोक लगा देगा।
(9)
पीड़ित, सुखबिर या साक्षियों के
विरुद्ध किसी प्रकार के अभित्रास, दबाव या प्रलोभन या हिंसा अथवा हिंसा की धमकी,
लिखित या मौखिक, शिकायत को दर्ज करने कर्तव्य जांच अधिकारी या थानेदार का होगा
तथा प्रथम सूचना रिपोर्ट की एक छायाप्राप्ति उन्हें तत्काल नि:शुल्क दी जाएगी।
(10) इस अधिनियम के तहत अपराधों से संबंधित सभी
कार्यवाहियों की विडियो बनायी जाएंगी।
(11) न्याय प्राप्त
करने में पीड़ितों और साक्षियों के निम्नलिखित अधिकारों व हकदारियों के क्रियान्वयन
को सुनिश्चित करने हेतु एक उपयुक्त स्कीम को विनिर्दिष्ट करने का कर्तव्य
संबंधित राज्य का होगा ताकि :-
(क) दर्ज की गई प्रथम
सूचना रिपोर्ट की एक प्रति नि:शुल्क उपलब्ध करायी जा सके;
(ख) पीड़ितों या उनके
आश्रितों को तत्काल नकद राहत या उत्पीड़न के समरूप वस्तु के रूप में राहत उपलब्ध
कराई जा सके;
(ग) अत्याचार के
पीड़ितों या उनके आश्रितों तथा साक्षियों आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध करायी जा सके;
(घ) संपत्ति की हानि या
चोट या मौत के संबंध में राहत उपलब्ध करायी जा सके;
(ड.) पीड़ितों हेतु भोजन
या जल या वस्त्रों या आश्रय स्थल या चिकित्सीय मदद या परिवहन सुविधा या दैनिक
भत्तों की व्यवस्था की जा सके;
(ट) अत्याचार के
पीड़ितों तथा उनके आश्रितों को गुजारे खर्चे को उपलब्ध कराया जा सके;
(ठ) शिकायत करते समय और
प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करते समय अत्याचार के पीड़ितों को अधिकारों के बारे में
सूचना उपलबध कराया जा सके;
(ड) अत्याचार के
पीड़ितों या उनके आश्रितों तथा साक्षियों को अभित्रास तथा उत्पीड़न से सुरक्षा
प्रदान की जा सके;
(ढ) अत्याचार के
पीड़ितों या उनके आश्रितों या संबंधित संगठनों या व्यक्तियों को जांच तथा
आरोप-पत्र की स्थिति के विषय पर सूचना उपलब्ध करायी जा सके तथा आरोप-पत्र की
प्रति नि:शुल्क उपलब्ध करायी जा सके;
(ण) चिकित्सीय परीक्षण
के दौरान आवश्यक सावधानी बरती जा सके;
(त) अत्याचार के
पीड़ितों या उनके आश्रितों या संबंधित संगठनों या व्यक्तियों को राहत की राशि की
सूचना उपलब्ध करायी जा सके;
(थ) अत्याचार के
पीड़ितों या उनके आश्रितों या संबंधित संगठनों या व्यक्तियों को जांच और मुकदमे
की तारीखों तथा स्थान के बारे में अग्रिम सूचना दी जा सके;
(द) अत्याचार के
पीड़ितों या उनके आश्रितों या संबंधित संगठनों या व्यक्तियों को मुकदमें की
तैयारी और केस के बारे में पर्याप्त सारभूत जानकारी दी जा सके और उक्त प्रयोजन
से कानूनी सहायता उपलब्ध करायी जा सके;
(ध) इस अधिनियम के तहत
कार्यवाहियों के प्रत्येक चरण पर अत्याचार के पीड़ितों या उनके आश्रितों या
संबंधित संगठनों या व्यक्तियों के अधिकारों को निष्पादित किया जा सके तथा
अधिकारों के कार्यान्वयन हेतु आवश्यक सहायता उपलब्ध करायी जा सके।
(12) अत्याचार
की पीड़ितों या उनके आश्रितों को गैर-सरकारी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं अथवा
अधिवक्ताओं की सहायता लेने का अधिकार होगा।
अध्याय-IV
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