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सुपरनोवा

आसमां में सितारे कम ना होंगे, अगर एक तारा सुपरनोवा हो गया तो।

चलने की अदा

दिखावा छोड़कर पैदल चलें      शहरी भारत को अपने पैदलपथों को मुक्त करके पैदल चलना आरम्भ करना होगा।        हमेशा की तरह, देश के संरचनात्मक ढांचे के निर्माण तथा सुधार पर खरबों रुपये खर्च करने का दिखावा करने वाला भारत एक चीज को नज़रअंदाज कर रहा हैः पैदलपथ अथवा पटड़ियां बिछाना। प्रत्येक स्तर पर सरकारी नीतियां, भारत को मोटर वाहनों पर आधारित देश बनाने पर तुली हुई हैं। पैदल चलने के लिए कोई राह नहीं है। साइकल-लेनों की बात छोड़ दीजिए, शहर दर शहर और नगर दर नगर पटड़ियों और पैदलपथों (फुटपाथों) पर सामान बेचनेवालों, वाहनों, गड्ढों, खुली नालियों ने कब्जा कर लिया है या फिर ये घोर नजरअंदाजी, दुर्दशा तथा लापरवाही का शिकार हो चुके हैं।        तेज गति से वाहन चलाना आज की जीवनशैली बन चुकी है। हर कोई नई गाड़ियों और नवीनतम सड़कों की बात करता है। वाहनों की संख्या असीमित रूप से बढ़ती जा रही है। कितने भी उड़ानपुल और पारपथ तथा ओवरब्रिज बनाए जाएं इस समस्या का हल नहीं होगा। केवल कुछ मील लम्बी नहीं बल्कि कई दिनों तक के ट्रैफिक ...

Problems arising during Hindi Translation of Scientific Terminology/वैज्ञानिक शब्दावली के हिंदी में अनुवाद के दौरान पेश आने वाली समस्या

अकसर अनुवाद करते समय एक समस्या सामने आती है कि क्या वैज्ञानिक शब्दावली को हिंदी में अनुवाद करना चाहिए या नहीं अर्थात् उसी भाषा के शब्द को हिंदी में (ट्रांसलिटरेट करके) लिख देना चाहिए , जिस भाषा में उस विषय पर मूल सिद्धान्त दिया या खोज की गई थी। जैसे क्या इलैक्ट्रॉन को इलैक्ट्रॉन ही लिख देना चाहिए या इसे कोई हिंदी का सरल शब्द दिया जाए जैसे कि ‘ ऋणात्मक कण ’ या ऐसा ही कुछ और जिससे इसके पढ़ते ही इस कण के बारे में सहज अनुभूति पाठक अपनी भाषा में अपने मस्तिष्क में कर सके। पंजाबी के साहित्यकार श्री कुलदीप सिंह धीर मानते हैं कि पंजाबी में सांईस पढ़ाते समय वैज्ञानिक शब्दावली का पंजाबी में अनुवाद करने का कोई लाभ नहीं है। क्या सल्फर को गंधक नहीं लिखना चाहिए ? क्या थ्योरी ऑफ रिलेटिववीटी का भारतीय भाषा में अनुवाद नहीं करना चाहिए। यह एक तथ्य है कि हम अपनी भाषा में चीजों को बेहतर ढ़ंग से सहज ज्ञान के माध्यम से सहजता से समझ लेते हैं। मुश्किल ये है कि पश्चिमी विज्ञान अभी चरण वार खोज की दिशा में है, जबकि भारतीय विज्ञान को कहानियों में समेट कर तब गुरुकलों में पढ़ाया जाता था जब लिखने के साधन बहुत म...