दक्षिण भारतीय मंदिरों की आर्थिक गतिविधियां


मध्‍यकालीन दक्षिण भारतीय मन्दिर की आर्थिक गतिविधियां
      अठाहरवीं और उन्‍नीसवीं सदी में अंग्रेजों के नियंत्रण से पूर्व दक्षिण भारत की कृषि प्रधान अर्थव्‍यवस्‍था में मध्‍यकालीन दक्षिण भारतीय हिन्‍दू मन्दिरों का अत्‍यधिक आर्थिक महत्‍व था।
      वर्तमान अध्‍ययन आन्‍ध्र प्रदेश के वर्तमान चित्‍तूर जिले के तिरूपति में स्थित, और दक्षिण भारतीय मन्दिरों में सबसे महत्‍वपूर्ण, एक तीर्थ-मन्दिर श्री वेंकटेश्‍वर के लगभग 100 शिलालेखों के उद्धरणों पर किए गए कार्य का परिणाम है। ये शिलालेख मुख्‍यतया नौवीं से सोलहवीं शताब्दियों के हैं, इस प्रकार ये किसी भारतीय मन्दिर की मध्‍यकालीन सामग्री का सबसे उम्‍दा संग्रह हैं। तिरूपति के शिलालेखों का संबंध निश्चित रूप से भूमि और धन के धर्मदान से है और इसीलिए यह धार्मिक दान में प्राप्‍त निधियों के रूप में मन्दिर के पास रखी गई भूमि और धन की प्रकृति एवं उपयोगिता के विश्‍लेषण के लिए बहुत ही उपयोगी है। इस सामग्री से तमिल देश के अन्‍य हिस्‍सों से कर्मकाण्‍डों के रूपों को अपनाने के कारण मन्दिर के कर्मकाण्‍ड में सुधार से संबंधित आवश्‍यक जानकारी भी प्राप्‍त होती है।
      तिरूपति का शिला अभिलेख पंद्रहवीं सदी के मध्‍य से लेकर सोलहवीं सदी के मध्‍य तक सर्वाधिक परिपूर्ण है। उस सदी में, मन्दिर को दक्षिण भारत के विजयनगर शासकों का संरक्षण प्राप्‍त हुआ था और मन्दिर दक्षिण के अग्रगण्‍य तीर्थ-मन्दिर के रूप में फला-फूला। 1456 और 1570 के दौरान, मन्दिर को दान के रूप में बहुत विशाल धनराशि और सौ से अधिक गांव प्रदान किए गए, जिससे प्राप्त आय को तीन सौ से अधिक दानकर्ताओं के नाम से धार्मिक-अनुष्‍ठान करने में व्‍यय किया गया था। दान की धनराशि एवं ग्राम का उपयोग करके मन्दिर द्वारा तिरूपति के चारों ओर सिंचाई सुविधाओं  का विकास किया गया था।
तिरूपति में सिंचाई के विकास के लिए साधन तथा संगठन :
      तिरूपति में सिंचाई का विकास प्रथम तो इसलिए महत्‍वपूर्ण था क्‍योंकि इसने मौद्रिक दान राशि के लिए एक विश्‍वसनीय एवं स्थिर निवेश का अवसर प्रदान किया। इस सिंचाई कार्यक्रम द्वारा धन-दानकर्ता को दिए गए आश्‍वासन के अभाव में मन्दिर के देवताओं के लिए दान की गई धनराशि का अनुपात शायद कम रह जाता। इस प्रकार, मन्दिर का संस्‍थात्‍मक विकास मन्दिर द्वारा चलाए गए कृषि विकास कार्यक्रम पर पूर्णतया निर्भर एवं उससे जुड़ा हुआ था ।
     
       मन्दिर के एक कुशल लौकिक प्रबंधन का विकास भी सिंचाई कार्यक्रम से गहराई से जुड़ा था। 1380 कें दशक में, तिरूपति मन्दिर बारह ट्रस्टियों (स्‍थानात्‍तदर) के प्रबंधन के अधीन रहा । 1450 के दशक से, मन्दिर के प्रबंधन कार्यों में परिवर्तन हुआ। सिंचाई कार्यक्रम में यह एक महत्‍वपूर्ण कारक था। मन्दिर में आने वाले संसाधनों का परिमाण और मन्दिर का लौकिक प्रबंधन अन्‍योन्‍याश्रित थे । पंद्रहवीं सदी के अंत और शुरूआती सोलहवीं सदी में धन तथा भूमि के धार्मिक-दाय के हिस्‍से में वृद्धि अवश्‍य ही प्रबंधन के कुशल तथा उत्‍तरदायी होने के कारण थी, विशेषकर विजयनगर शासकों के संरक्षण के दौरान। सोलहवीं सदी के दौरान, जब दान के परिमाण में लगातार वृद्धि होती गई तो मन्दिर के लौकिक संगठन में संसाधनों के निवेश को बढ़ावा देने और उसके समावेशन के प्रति बदलाव आ गया । 
       


काश्‍तकारी प्रणाली और मन्दिर की भूमि
मन्दिर के मुख्‍य संसाधनों में दान स्‍वरूप प्राप्‍त भूमि (गांव, गांवों के भाग, अथवा कृषि योग्‍य भूमि के भूखण्‍ड) थी। मन्दिर को प्रदान की गई भूमि के दो कार्य थे :-
(i)       आय उत्‍पन्‍न करना जिससे भूमि के दानकर्ता के नाम से विशिष्‍ट धार्मिक कर्मकाण्‍ड किया जाता रहे,
(ii)      धनराशि के दानकर्ता के नाम से सेवाएं चलाने के लिए मन्दिर को प्रदान की गई निधियों के निवेश हेतु उत्‍पादक स्‍थान उपलब्‍ध कराना ।
पंद्रहवी और सोलहवीं सदियों में भू-काश्‍तकारी की सामान्‍य दशाओं का प्रभाव मन्दिर और इसे प्रदत्‍त भूमि के संबंधों पर था । उस काल में, तीन या शायद चार प्रकार की आधारभूत काश्‍तकारी  थी :-
(i)       राजकीय भूमि (भंडरवाड़ा) जो कि साम्राज्‍य के राजस्‍व प्रशासन के सीधे नियंत्रण में थी और जिससे शासन को इसके राजस्‍व का महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा मिलता था,
(ii)       स्‍थानीय मुखियाओं और सामंतों (नायकों) के द्वारा सैन्‍य-सेवा काश्‍तकारी के रूप में नियंत्रित भूमि (अमाराम), जो अपने अमाराम गांवों की आय का एक भाग साम्राज्‍य के राजकोष में भेजते थे और एक भाग को सैनिकों की  एक टुकड़ी के भरण-पोषण के व्‍यय के लिए रखते थे,
(iii)     ब्राह्मणों (ब्रह्मादाय), मन्दिरों (देवदाना) और पारम्‍परिक शैक्षिक संस्‍थानों, अथवा मठों (मठापुरा) द्वारा खैराती-काश्‍तकारी के अधीन नियंत्रित भूमि।

    मठों को प्रदत्‍त भूमि मन्दिरों को दी गई भूमि से इस प्रकार भिन्‍न थी कि मठ प्रबंधक एवं मुख्‍य शिक्षक को मठ को दी गई भूमि की देखरेख के लिहाज से मालिक माना जाता था, जबकि मन्दिर की भूमि मन्दिर-प्रबंधकों द्वारा देवता, जिसे भूमि दान की गई थी, के नाम से न्‍यास (ट्रस्‍ट) के अधीन रखी जाती थी । इस बारे में विवाद रहा है कि क्‍या मध्‍यकालीन दक्षिण भारत में एक चौथी प्रकार की काश्‍तकारी प्रणाली किसान-मालिकाना-काश्‍तकारी भी थी ।

     सभी मूल चार प्रकार की काश्‍तकारियों के अन्‍तर्गत भूमि मन्दिर को प्रदान की जाती थी । इन गांवों के दानकर्ताओं को तीन समूहों में बांटा जा सकता है, और दानकर्ता-समूहवार मन्दिर- गांवों के निम्‍नलिखित वर्गीकरण और उनके संबंधित काश्‍तकारी प्रकार को देखा जा सकता है :-
सारणी 1 : दानकर्ता समूहों द्वारा ग्राम दान और काश्‍तकारी के प्रकार, 1509-68
दानकर्ता समूह
काश्‍तकारी का प्रकार
1509-30
1530-42
1542-68
योग
क.    दानकर्ता राज्‍य
राजकीय और सेवा काश्‍तकारी
12
10
40½
62½
ख.    मन्दिर के पदधारी
खैराती काश्‍तकारी
5
19½
18½
43
ग.     स्‍थानीय निवासी और व्‍यापारी
कुछ सेवा, कुछ किसान मालिकाना काश्‍तकारी
½
6
3
9½


17½
35½
62
115

312 तिरूपती शिलालेखों पर आधारित विविध भूमि दान सम्मिलित नहीं हैं । सोलहवीं सदी के ज्‍यादातर अवधि के दौरान, राजकीय और सेवा भूमियों को एक ही प्रकार की माना जाए । राज्‍य अधिकारियों और कर अधिकारियों के अधीन सेवा भूमि सैन्‍य टुकड़ी के खर्चे पूरे करने के साथ-साथ साम्राज्‍य के राजस्‍व की भी पूरक थी । इस प्रकार, सेवा-काश्‍तकारी भूमियों के दानकर्ताओं के लिए ऐसी भूमियों को मन्दिर को देने से पूर्व साम्राज्‍य शासन से आज्ञा प्राप्‍त करना निसंदेह आवश्‍यक था, क्‍योंकि ऐसे दान से उनके कार्यालय के प्रभाव के साथ ही साम्राज्‍य का राजस्‍व भी घटता था।

      राजकीय ग्रामों और सेवा-काश्‍तकारी ग्रामों (जो मन्दिर के अधीन दिए गए गांवों का 91  प्रतिशत था) से प्राप्‍त आय को दो मुख्‍य हिस्‍सों में बांटा जाता था: एक प्रमुख हिस्‍सा" मिलवरम) और एक गौण हिस्‍साकुडीवरम अथवा किल-वरम)। गांवों से प्राप्‍त आय का प्रमुख हिस्‍सा राज्‍य अथवा सैन्य प्रयोजनों में लगाया जाता था । गौण हिस्‍सा भूमि के किसानों द्वारा रख लिया जाता था। ये दोनों पारम्‍परिक हिस्‍सेधारक राजकीय अथवा सेवा काश्‍तकारी के अधीन गांवों की वार्षिक फसलों पर दावे पेश करते थे । जब राजकीय अथवा सेवा काश्‍तकारी के अधीन कोई गांव मन्दिर को प्रदान कर दिया जाता था तो गांव की आय को प्रमुख तथा गौण हिस्‍सों में विभाजित कर दिया जाता था । यद्यपि, अब मन्दिर-ग्राम की आय का प्रमुख हिस्‍सा मन्दिर को जाता था । गौण हिस्‍सा पहले की तरह किसानों के पास रहता था । दान भूमि का प्रमुख उद्देश्‍य अनुष्‍ठान-सेवा हेतु लगातार आय उपलब्‍ध कराना और मौद्रिक दान के निवेश के लिए एक स्‍थान उपलब्‍ध कराना था। मन्दिर की भूमियों में उनके विकास और उनमें निवेश किए जाने की योग्‍यता के लिहाज से विभिन्‍नता थी। विकास के प्रयोजनों से, मन्दिर-ग्राम की काश्‍तकारी का सबसे अधिक सीमाबद्ध प्रकार वह था जिसमें इस शर्त के अधीन भूमि प्रदान की जाती थी कि भूमि पर काश्‍तकारी के अधिकार दानकर्ता के पास रहेंगे (कानीयाची), और कि दानकर्ता मन्दिर में प्रतिवर्ष एक तय धनराशि देगा।
 
    दान की भूमि का एक अन्‍य सीमाबद्ध काश्‍तकारी का प्रकार वह था जिसमें प्रदान की गई भूमि से निर्धारित राजस्‍व के रूप में एक स्थिर आय प्राप्‍त होती थी, परन्‍तु इसमें न तो गांव से प्राप्‍त आय पर कोई अधिकार था और न ही कब्‍जाधारकों के मामले  में कोई हस्‍तक्षेप करने की शक्ति। इसे स्रैत्रियम काश्‍तकारी कहा जाता था, और स्रैत्रियम गांव के दानकर्ता को यह अधिकार राज्‍य से सम्‍मान के रूप में अथवा किसी की गई सेवा को मान प्रदान करने के स्‍वरूप प्राप्‍त होता था।
उपर्युक्‍त मामले के अपवाद में, मन्दिर इसे दान की गई भूमि को विकसित कर सकता था और इससे अतिरिक्‍त आय प्राप्‍त कर सकता था ।
मौद्रिक धार्मिक-दान
      तिरूपति मन्दिर को विशाल धनराशि का दान पंद्रहवी शताब्‍दी के मध्‍य से मिलना आरम्‍भ हुआ । सम्‍पूर्ण सोलहवी शताब्‍दी के दौरान, दानकर्ताओं ने मन्दिर को धन दिया ताकि उनके दान का निवेश मन्दिर की भूमि में किया जाए । मन्दिर को मन्दिर-गांव में मौद्रिक दान के निवेश से इस गांव से प्राप्‍त आय के मुख्‍य हिस्‍से के रूप में नवीन आय प्राप्‍त हुई । धन के दानकर्ता की आय प्राप्ति इस रूप में थी कि उसके नाम से कर्मकाण्‍ड संपन्‍न किया जाता था । चढ़ावे के कुछ भोज्‍य पदार्थों, जो कि इस काल में सेवा का ठेठ रूप था, की लागत पता करके, दानकर्ता की वार्षिक आय को उसके धार्मिक-दान के प्रतिशत के रूप में ज्ञात करना संभव था।
      एक धार्मिक-दान की वास्‍तविक आय को दो कारकों ने प्रभावित किया होगा : (1) खेतों की मिट्टी की उर्वरता के आधार पर आय-अर्जन क्षमता और भूखण्‍ड का आकार, (2) मन्दिर, जिसे मुख्‍य हिस्‍से का अधिकार प्राप्‍त था, और काश्‍तकारों अथवा किसानों, जो गौण हिस्‍से के हकदार थे, के मध्‍य भूमि से प्राप्‍त आय का विभाजन । प्रथम बिन्‍दु पर और अधिक टिप्‍पणी करने की आवश्‍यकता नहीं है क्‍योंकि यह स्‍वत: स्‍पष्‍ट है कि एक पूंजी निवेश से भूखण्‍डों की आय-उत्‍पन्‍न करने की क्षमता भिन्‍न-भिन्‍न होगी । दूसरा बिन्‍दु अधिक महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि मन्दिर भूमि का दान प्राप्‍त करने के फलस्‍वरूप उस भूमि की आय के निर्धारित हिस्‍से का अधिकारी बन जाता था । आय के इन हिस्‍सों का कोई स्थिर परिमाण नहीं होता था, और गांव के दान से पूर्व लागू व्‍यवस्‍था के अन्‍तर्गत किसी मन्दिर के गांव के लिए स्‍थापित परिमाण पर निर्भर करते हुए मन्दिर द्वारा किया गया दावा 51 प्रतिशत और 75 प्रतिशत के बीच बदलता रह सकता था ।
धन के दानकर्ता के लिए निष्‍पादित की गई सेवा के मूल्‍य की गणना करने पर 1535-47 के वर्षों में मौद्रिक दान पर औसत वार्षिक आय 10 प्रतिशत के लगभग थी । मौद्रिक दान से मन्दिर को होने वाली आय और धन से प्राप्‍त कुल आय के मध्‍य के अन्‍तर को कृषि विकास में पूंजी निवेश के रूप में देखा जाता था जो काफी बड़ी मात्रा होती थी । ये अन्‍तर ही मन्दिर द्वारा चलाए गए सिंचाई कार्यक्रम से हुए कल्‍याण का माप था ।
      मन्दिर-ग्राम में निवेश से हुए प्रत्‍येक पूंजी उन्‍नयन के कारण हुए अतिरिक्‍त उत्‍पाद अथवा आय का हिस्‍सा मन्दिर-ग्राम की आय के गौण-अंशधारक के पास रह जाता था । इस अतिरिक्‍त आय से, जिसका मुख्‍य और गौण-अंशों के विभिन्‍न आकारों में सौ से अधिकगांवों तक विस्‍तार था, मन्दिर-ग्राम भूमि के किसानों के जीवन स्‍तर पर अवश्‍य ही अच्‍छा प्रभाव पड़ा होगा ।
दानकर्ता
1509-30
1530-42
1542-68
मूल्‍य (पणम)
कुल का प्रतिशत
मूल्‍य (पणम)
कुल का प्रतिशत
मूल्‍य (पणम)
कुल का प्रतिशत
दानकर्ता राज्‍य

33

65

20.5
वायसराय
-
-
30675
6.5


मुख्‍यमंत्री
1200
1.0




मुख्‍य कमांडर
-
-
15000
3


जनरल्‍स
18980
12.0
145200
30.5
4260
2.5
रायल अधिकारी
19990
13.0
11010
2.0
1580
1.0
अधीनस्‍थ और कर अधिकारीगण
11320
7.0
106820
23.0
32840
17.0
मन्दिर के अधिकारीगण

26.0

24.0

23.5
मन्दिर के पुरोहित
28215
18.0
66963
15.0
22482
12.0
संगीतज्ञ, कवि, नर्तक
2500
1.5
30480
6.0
6340
4.0
विद्वान
2520
1.5
4185
1.0
5747
3.0
मन्दिर के लेखाकार
7446
5.0
8270
2.0
7802
4.5
स्‍थानीय निवासी और व्‍यापारी वर्ग

41.0

11.0

56.0
तिरूपति के व्‍यापारी और निवासी
25625
23.0
41695
9.0
54405
28.0
सामान्‍य भक्‍तगण
27560
18.0
10293
2.0
54150
28.0
योग
155606
100.0
100.0
469901
100.0
186606
100.0



100.0

100.0

      सोलहवी शताब्‍दी में मन्दिर को मिले मौद्रिक दान के स्रोत और परिमाण पर विशेष ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है । सारणी – 2 में कृष्‍णदेवराय, अच्‍युतादेवराय, और सदाशिवराय के विजयनगर शासन काल के अनुसार 1509-68 तक के वर्षों के लिए 312 तिरूपति शिलालेखों से आंकड़ों का सार दिया है । सारणी-2 में दर्शाया गया मैट्रिक दान 1509-30 की अवधि और 1530-42 की अवधि के मध्‍य लगभग तीन गुना बढ़ा है और तब 1542-68 की अवधि में लगभग उसी मात्रा में घटा है । इस अवधि में अन्‍य अवधियों की तुलना में 17,000 पंजम प्रति वर्ष के लगभग ।
      अच्‍युतादेवराय के राज्‍यकाल संबंधी तुलनात्‍मक विशाल मौद्रिक दान, और विशेषकर राज्‍य दानकर्ताओं द्वारा दिए गए दान की व्‍याख्‍या अवश्‍य ही अटकलों पर आधारित रही होगी । संभवतया यह तार्किकरूप से स्‍वीकार्य है कि पूर्व और पश्‍चात की अवधियों के तुलनात्‍मक छोटे धर्मदानों की तुलना में 1530-42 की अवधिके मौद्रिक दान में वृद्धि का कारण कृष्‍णदेवराय के अधीन पूर्व के बीस वर्षों का स्थिर शासन था । कृष्‍णदेवराय के काल के दौरान, साम्राज्‍य विध्‍वंसकारी आक्रमणों से मुक्‍त था, देश एक शक्तिशाली तथा एकीकृत संघीय शासन के अधीन था । इसके अलावा, शायद कृष्‍णदेवराय द्वारा लड़े गए युद्धों में सफलता से साम्राज्‍य के राजकोष में और राज्‍य के अधिकारियों के राजकोषों में मौद्रिक सम्‍पत्ति की वृद्धि हुई थी, जिसका कम से कमकुछ हिस्‍सा तो दक्षिण भारतीय मन्दिरों के खजानों में भी पहुंच ही गया था । 1530-42 के वर्षों में मौद्रिक-दान में वृद्धि का एक अन्‍य कारण मन्दिर के यश का प्रसार और जिसके साथ ही दूर-दराज के दानकर्ताओं में हुई वृद्धि थी । जिसके परिमणामस्‍वरूप, मौद्रिक दान ने तिरूपति से अधिक दूरी के ग्रामों के प्रबंधन में मन्दिर-प्रबंधकों को आने वाली कठिनाई के कारण भूमि-दान का स्‍थान ले लिया ।
      अच्‍युतादेवराय के काल में मौद्रिक धर्म-दान के परिमाण के लिए एक अन्‍य स्‍पष्‍टीकरण उस काल की राजनीतिक दशाओं में पाया जा सकता है । अच्‍युतादेवराय के शासन के अन्तिम छह वर्ष, 1536-42, शासक का तख्‍तापलट करने और उसके भतीजे सदाशिव को स्‍थापित करने के प्रयास के कारण बढ़े हुए संकट का काल थे ।    
      विजयनगर सिंहासन के लिए संघर्ष कृष्‍णदेवराय की मृत्‍यु से थोड़ा पहले ही तब शुरू हो गया था जब उसने अपने भाई अच्‍युता, जिसे कृष्‍णदेवराय के एक विश्‍वस्‍त सैनिक और लेफ्टीनेंट रामराजा से मार्गदर्शन लेना स्‍वीकार्य होता, को सिंहासन पर बैठाने का निर्णय लिया । कृष्‍णदेवराय के दो उत्‍तराधिकारियों के बीच आपसी सहयोग कभी-भी स्‍पष्‍टतया आसान नहीं रहा, और अच्‍युतादेवराय इस संबंध को 1536 तक केवल इसलिए सहन करना रहा क्‍योंकि रामराजा महान सम्राट के सबसे निकट के वंशज कृष्‍णदेवराय के शिशु-पुत्र का अभिभावक था। जब बच्‍चे की 1535 में मृत्‍यु हो गई, अच्‍युतादेवराय ने स्‍पष्‍ट रूप से रामराजा को अपना मुख्‍य सभासद मानना बंद कर दिया । जिससे दोनों के बीच खुली शत्रुता उत्‍पन्‍न हो गई । इसलिए 1535-36 के वर्ष अच्‍युतादेवराय के लिए निर्णायक थे, क्‍योंकि इस काल से 1542तक उसके अधिक अनुभवी प्रतिद्वन्‍दी के विरूद्ध अधिकतम समर्थन हासिल करना आवश्‍यक था । 1536-42 के वर्षों के लिए तिरूपति शिलालेख उस काल के राजनीतिक संकट को दर्शाते प्रतीत होते हैं । राजकीय दानकर्ताओं द्वारा तीन-चौथाई मौद्रिक-धर्मदान अच्‍युतादेवराय और रामराजा के बीच खुला संघर्ष विकसित होने के पश्‍चात किया गया । मौद्रिक धर्मदान का अभिलेख करने वाले 31 शिलालेखों में से 6 शिलालेख  दानकर्ताओं के रूप में महत्‍वपूर्ण सैन्‍य नायकों को चिह्नित करते हैं, तथा ये सभी 1535 और 1541 के मध्‍य आया । राजकीय दानकर्ताओं के सभी शिलालेख अच्‍युतादेवराय के शासन को मानते हैं । विजयनगर शासकों के लिए विशेष महत्‍व के साथ तिरूपति मन्दिर को दक्षिण भारत का उस काल में श्रेष्‍ठ मन्दिर माना गया था । इस प्रकार, अच्‍युतादेवराय के शासन को मान्‍यता देने वाले महत्‍वपूर्ण अधिकारियों द्वारा दिए गए दान का लेख संघर्ष काल के दौदान सम्राट को उसके प्रतिद्वन्दियों के विरूद्ध प्राप्‍त समर्थन को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने का एक तरीका था । संभवतया अच्‍युतादेवराय उसे प्राप्‍त समर्थन के परिमाण को जितना संभव हो उतना रामराजा के शक्ति-केन्‍द्र में परवर्ती की समर्थन के लिए अपील को प्रभावहीन करने हेतु प्रचारित करना चाहता था । इस उदाहरण में, यह सुझाया जा सकता है कि मन्दिर ने पूजा केन्‍द्र से अधिक राजनीतिक निष्‍ठा को रिकार्ड करने के स्‍थान के रूप में अधिक कार्य किया ।  
      सारणी 2 में 1530-42 की अवधि के बहुत ही विशाल मौद्रिक धर्मिक-दान के अलावा राजकीय दानकर्ताओं की महत्‍वपूर्ण भूमिका भी प्रकट की गई है । मौद्रिक धर्मदान की दो अन्‍य महत्‍वपूर्ण विशेषताएं नोट की जानी चाहिए : (i) तिरूपति के निवासियों और व्‍यापारियों का भारी समर्थन और (ii) मन्दिर के पदधारियों से प्राप्‍त मौद्रिक धर्मदान का स्थिर स्‍तर । कृष्‍णदेवराय के काल से ही स्‍थानीय भक्‍तों और मन्दिर के पदधारियों से प्राप्‍त मौद्रिक धर्मदान के परिमाण में लगातार वृद्धि होती रही ।
      यदि मन्दिर-पदधारियों और भगवान श्री वेंकटेश्‍वर के स्‍थानीय भक्‍तों से प्राप्‍त धार्मिक-दान, इस सारे को व्‍यैक्तिक अथवा गैर-राजकीय के रूप में श्रेणीबद्ध किया जा सके तो कृष्‍णदेवराय के काल में व्‍यैक्तिक मौद्रिक-दान का अंश 1509-30 के वर्षों में कुल दान का 67 प्रतिशत, अच्‍युतादेवराय के काल में कुल का 35 प्रतिशत और सदाशिराय के काल में कुल का 79 प्रतिशत था ।तिरूपतिनगर को श्री वेंकटेश्‍वर तीर्थ मन्दिर के साथ एक उपनगर के रूप में विकसित किया गया, और ये मन्दिर के प्रति पूरी तरह समर्पित एवं उस पर आश्रित रहा । नगर के व्‍यापारी, शिक्षक और शिल्‍पकार अपनी जीविका मन्दिर से प्राप्‍त करते थे और आवश्‍यकता पड़ने पर खुलकर सहायता के लिए आगे आते थे । सदाशिवराय के समय के दौरान विशेषकर यह सहायता प्रकट होती है, क्‍योंकि तब साम्राज्‍य अशक्‍त हो रहा था, और घटे हुए मौद्रिक-दान से अनुमान लगाएं तो अवश्‍य ही लगातार आर्थिक अव्‍यवस्‍था रही होगी ।  इतना ही नहीं, सदाशिवराय ने अपने पूर्वजों की तरह मन्दिर को सीधी सहायता नहीं दी थी । 1542-68 की अवधि के दौरान, आधे से अधिक मौद्रिक-दान तिरूपति तथा आस-पास के क्षेत्रों के निवासियों तथा व्‍यापारियों से आया था ।
      मन्दिर के पदधारियों द्वारा दिए गए धार्मिक-दान का जो परिमाण सारणी-2 में दर्शाया गया है उससे यह प्रश्‍न उठता है कि वे  कौन से साधन थे जिनके द्वारा ये लोग सोलहवीं सदी में उनके  धार्मिक-दान के रूप में प्रस्‍तुत विशाल धनराशि का संग्रह करने में सक्षम थे ।  इस प्रश्‍न का उत्‍तर उस तरीके में  छुपा है, जिसके अनुसार प्रसाद मन्दिर में बांटा जाता था और मन्दिर में तीर्थयात्रियों के लिए इस भोजन का जो मान था । खाद्य पदार्थों का चढ़ाना, मन्दिर के देवताओं को भेंट करने के पश्‍चात लोगों के दो समूहों में वितरित किया जाता था :- (i) मन्दिर के पदधारियों, जैसा कि उल्‍लेख किया गया था, को प्रत्‍येक चढ़ावे का तीन चौथाई भरण-पोषण भत्‍ते के रूप में मिलता था और (ii) धन के दानकर्ताओं को अपने स्‍वयं के लिए एक चौ‍थाई हिस्‍सा मिलता था । तीर्थयात्रियों में प्रसाद की मांग होने के कारण यह एक महत्‍वपूर्ण वस्‍तु बन गया । जैसे-जैसे पंद्रहवी और सोलहवीं सदी के विजयनगर शासकों के सरंक्षण में मन्दिर के दान में वृद्धि होती गई, कर्मकाण्‍ड और अधिक बारंबार तथा भव्‍य होने लगे, जिससे तीर्थयात्रियों की संख्‍या बढ़ गई ।
      तिरूपति के तीर्थयात्री प्रसाद की कामना इसलिए करते थे क्‍योंकि इस पवित्र भोजन को जब तिरूपति में खाया जाता अथवा अन्‍यों के लिए तीर्थयात्री के गांव ले जाया जाता था, तो इससे अतिरिक्‍त पुण्‍य फल मिलता था । जैसे-जैसे तीर्थयात्रियों की संख्‍या में वृद्धि हुई, पवित्र भोजन की मांग बढ़ती गई । तिरूपति मन्दिर के शिलालेखों से यह स्‍पष्‍ट होता है कि वहां पवित्र भोजन का व्‍यापार होता था । तिरूपति के कुछ शिलालेखों में दानकर्ता के अपने पवित्र भोजन के एक चौथाई हिस्‍से को विक्रय करने अथवा हस्‍तांतरित करने के अधिकार का संदर्भ मिलता है, और पवित्र भोजन के सम्‍पन्‍न पदधारियों की उपस्थिति इंगित करती है कि यह एक स्‍थापित चलन था ।
      मन्दिर को धन का दान मिलने में प्रसाद की आर्थिक कीमत की एक महत्‍वपूर्ण भूमिका थी । प्रसाद को धन में परिवर्तित किए जाने की योग्‍यता के कारण मन्दिर के पदधारी 1500-68 की अवधि में लगभग एक चौथाई धनराशि के मूल्‍य का दान दे पाते थे । मन्दिर के पदधारियों और दानकर्ताओं को देय प्रसाद को धन में परिवर्तित करने वाले विनिमय- अंत:संबंधी  का आरेखीय प्रस्‍तुतिकरण चित्र-1 में है । मूल मौद्रिक दान का प्रवाह दानकर्ता से प्रबंधक की ओर तथा प्रबंधक से कुछ मन्दिर-ग्रामों की ओर देखा जा सकता है । किए गए निवेश के कारण प्रसाद का प्रवाह विपरीत दिशा में होगा, और यह प्रसाद प्रबंधकों द्वारा दानकर्ताओं अथवा दानकर्ता द्वारा किसी पदनामित को (एक चौथाई हिस्‍सा) और मन्दिर के पदधारियों को (तीन चौथाई हिस्‍सा) वितरित किया  जाएगा ।
चित्र-1 इस वितरण को दर्शाता है, दोहरी पंक्तियां उपर्युक्‍त धन तथा प्रसाद के प्रवाह को बताती हैं । अविच्छिन्‍न दोहरी पंक्ति द्वारा दर्शायी गई धनराशि का उद्गम दो प्रकार दानकर्ता थे : (i) राजकीय दानकर्ता, भक्‍तगण, और तिरूपति के आस-पास के व्‍यापारी (सारणी-2 में दानी समूह और ) (2) मन्दिर के पदधारी (सारणी-2 में दानी समूह ) । ये दोनो दानी समूह प्रसाद भी प्राप्‍त करते थे जैसे कि विच्छिन्‍न पंक्तियों द्वारा दर्शाया गया है । दानकर्ता को देय प्रसाद के एक चौथाई हिस्‍से में से, कुछ दानकर्ता जिस प्रसाद को मन्दिर को लघु संस्‍थाओं को देने के लिए कहते थे, उसे मन्दिर प्रबंधकों से इन लघु संस्‍थाओं की ओर जाती हुई विच्छिन्‍न पंक्तियां दर्शाती हैं । 
      यद्यपि, प्रसाद और धन का एक द्वितीय वितरण भी था, जिसे इकहरी पंक्ति द्वारा चित्र-1 में दर्शाया गया है । यहां, प्रसाद के प्राथमिक वितरण के प्राप्‍तकर्ता जैसे कि मन्दिर के पदधारी, राजकीय तथा स्‍थानीय दानकर्ता, और मन्दिर के लघु संस्‍थान, दानकर्ताओं के रूप में, उन्‍हें देय प्रसाद में से हिस्‍सा एक वार्षिक भुगतान के रूप में पदा‍धारियों को देते थे । प्रसाद का यही वह द्वितीय वितरण था जिससे प्रसाद के मुख्‍य दावेदार, मन्दिर के पदधारियों को मौद्रिक आय होती थी और जिससे पदधारी मन्दिर के संसाधनों में प्रभावशाली अंशदान करने में सक्षम हुए । पंद्रहवी और सोलहवी सदियों के दौरान धन और भूमि के दान में विशाल वृद्धि के कारण मन्दिर के प्रबंधन और मन्दिर संगठन में परिवर्तन हुए । पंद्रहवी सदी के मध्‍य से लेकर सोलहवी सदी के मध्‍य तक मन्दिर-ग्रामों की संख्‍या लगभग पंद्रह से बढ़कर सौ से अधिक  हो गई थी, मौद्रिक-दान, जिसके साथ उत्‍पादक निवेश का उत्‍तरदायित्‍व जुड़ा था, विशाल अनुपात में हो गया था । तीव्र विकास की इस सदी के दौरान, मन्दिर का मूल सैक्‍यूलर प्रबंधन अक्षुण्‍ण रहा । प्रबंधन के बारह न्‍यासियों (स्‍तनादर) में से सात तिरूपति के आम निवासी और पांच मन्दिर के पदधारी होते थे ।


      तीर्थयात्रियों की बढ़ी हुई संख्‍या के आराम को ध्‍यान में रखते हुए विश्राम-गृहों और पाकशाला के साथ-साथ अनेक लघु मन्दिर स्‍थापित किए गए थे । इन नए संस्‍थानों के पास अपने स्‍वयं के प्रबंधकों (करतार), कोष और भण्डार-गृहों के होने से बड़े स्‍तर की वित्‍तीय व्‍यवस्‍था एवं स्‍व-प्रबंधन था । इन संस्‍थानों के लिए स्‍थायी धार्मिक दान की विशेष व्‍यवस्‍था की गई थी, और इन दोनों से प्राप्‍त आय नियमित मन्दिर आय का हिस्‍सा नहीं बनती थी । अत: नए संस्‍थानों के विकसित होने से मन्दिर के मूल संगठन में तो कोई परिवर्तन नहीं हुआ, परन्‍तु मन्दिर प्रबंधन के कार्यों में महत्‍वपूर्ण परिवर्तन हो गया था । स्‍थनात्‍तदरों का कठोर और एकछत्र नियंत्रण ढीला पड़ गया था । हालांकि, कुल मिलाकर नियंत्रण अभी-भी स्‍पष्‍ट रूप से उन्‍हीं का था ।
             प्रशासनिक विकेन्‍द्रीकरण के कारण गैर-धार्मिक मामलों के प्रबंधन में दो परिवर्तन हुए। प्रथम, मन्दिर प्रबंधकों ने मन्दिर-ग्रामों में मौद्रिक दान का निवेश करने और प्राप्‍तकर्ताओं के पहले से कहीं विशाल नेटवर्क को प्रसाद बांटने के विशिष्‍ट कार्यों को संभाल लिया। द्वितीय, नए संस्‍थानों का दैनादिन प्रबंधन इन संस्‍थाओं से संबद्ध पदधारियों और प्रबंधकों (करतारों) पर छोड़ दिया गया था । मन्दिर के प्रबंधकों ने वेकंटेश्‍वर और गोविंद राजस्‍वामी के मुख्‍य तीर्थ-मन्दिरों पर पूर्ण नियंत्रण रखा ।
      प्रबंधकीय कार्य का विकेन्‍द्रीकरण निसंदेह उच्‍चतर स्‍तर की कुशलता के लिए उचित था : मन्दिर प्रबंधक मुख्‍य तीर्थ मन्दिरों के प्रबंधन और निवेश प्रक्रिया पर ध्‍यान केन्द्रित करने को मुक्‍त रहे और जिन्‍हें अपने स्‍वयं के मामलों, विशेषकर उनके वित्‍तीय मामलों के प्रबंधन हेतु अन्‍य संस्‍थानों में अधिक रूचि थी उन्‍हें इसकी अनुमति मिल  गई। पंद्रहवी और सोलहवी सदियों के उत्‍तरार्ध में मन्दिर के गैर-धार्मिक प्रबंधन की मुख्‍य उपलब्धि मन्दिर के मौद्रिक और भू-संसाधनों का उत्‍पादक संयोग था। एक लंबी अवधि तक स्‍थायी आय उत्‍पन्‍न करने के लिए विशाल दान निधि को सुरक्षित रूप से निवेश करने का उत्‍तरदायित्‍व एक कठिन कार्य था। दानकर्ता के नाम से चढ़ावे का वार्षिक मूल्‍य निर्धारित करने के लिए, मन्दिर-ग्राम में मौद्रिक दान के निवेश से संभावित थी। पूंजी निवेश से उत्‍पन्‍न नए आय अंशों के समायोजन के लिए भूमि से प्राप्‍त आय के गौण-हिस्‍से के अधिकारी, मन्दिर ग्राम के किसानों के साथ मोल-भाव करना भी स्‍पष्‍ट रूप से आवश्‍यक था । मन्दिर प्रबंधक नई सुविधाओं यथा तालाब और सिंचाई की नहरें, जिनके परिणामस्‍वरूप विशाल उत्‍पादन होता, के निर्माण के लिए भी उत्‍तरदायी था, मन्दिर निर्माण-कार्यालय की सहायता से उन्‍होंने इन सुविधाओं का निर्माण किया था । अन्‍तत: प्रबंधक दानकर्ताओं अथवा उनके द्वारा पद नामित व्‍यक्तियों को दानकर्ता के प्रसाद के हिस्‍से को बांटने के लिए उत्‍तरदायी थे । यह तथ्‍य कि अधिकांश अवधि के दौरान दान में वृद्धि हुई थी, इंगित करता है कि ये उत्‍तरदायित्‍व सफलतापूर्वक निभाए गए थे । यह मन्दिर के सैक्‍युलर प्रबंधन के लिए एक सम्‍मान की बात थी ।
निष्‍कर्ष :
      तिरूपति मन्दिर के धार्मिक का उपयोग करके सिंचाई के साधन विकसित करने का कार्यक्रम मध्‍यकालीन दक्षिण-भारत में कोई विशिष्‍ट घटना नहीं थी । ढेर सारे दक्षिण भारतीय शिलालेखों में अन्‍य हिन्‍दू मन्दिरों द्वारा चलाए गए इसी प्रकार के कार्यक्रमों के अनेक उदाहरण मिलते हैं । तिरूपति सामग्री कई सदियों की अवधि के लिए संपूर्ण है इसलिए मन्दिर के भूमि विकास कार्यक्रम की विस्‍तृत जांच-पड़ताल संभव है । वर्तमान अध्‍ययन में, तिरूपति मन्दिर के शिलालेखों के रिकार्ड के आधार पर इसकी कार्य प्रणाली की कुछ अधिक विस्‍तृत रूप से जांच-पड़ताल संभव हुई है । विस्‍तृत अध्‍ययन द्वारा सिंचाई और विकास से मन्दिर कार्यक्रमों में राज्‍य की महत्‍वपूर्ण भूमिका को दर्शाना संभव हुआ है । इससे यह प्रश्‍न उठता है कि इसी प्रकार के भूमि विकास से जुड़े अन्‍य मन्दिरों को कितनी मात्रा में अपने संसाधनों का मुख्‍य हिस्‍सा राजकीय-दानकर्ताओं से प्राप्‍त हुआ था , और इस प्रकार किस अनुपात में राजकीय संसाधन अप्रत्‍यक्ष रूप से मन्दिर प्रायोजित भूमि विकास को आबंटित हुआ था ।    
      अधिकतर सामान्‍य तौर पर, तिरूपति में सिंचाई के विकास में राज्‍य की भागीदारी से प्रश्‍न उठता है कि वास्‍तविक रूप से आर्थिक-केन्‍द्र न होकर भी महत्‍वपूर्ण आर्थिक क्रियाओं से युक्‍त मन्दिरों - जैसे केन्‍द्रों को राजकीय संसाधनों के पुनर्वितरण के माध्‍यम से क्‍या मध्‍यकालीन दक्षिण भारत के स्‍पष्‍टतया स्‍थानीय आर्थिक संगठन से जोड़ा नहीं जा सकता था ।    

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